नई दिल्ली: नागरिकता संशोधन विधेयक का संसद से लेकर सड़क तक विरोध हो रहा है. पूर्वोत्तर क्षेत्र के कई छात्र संगठन और राजनीतिक पार्टियां इसका विरोध कर रही हैं. आज 11 घंटे की हड़ताल बुलाई गई है. असम में बीजेपी सरकार में शामिल असम गण परिषद (एजीपी) ने भाजपा नीत गठबंधन सरकार से सोमवार को समर्थन वापस लेने का ऐलान किया. एजीपी पूरी ताकत से इस विधेयक का विरोध कर रही है. असम की 126 सदस्यीय विधानसभा में एजीपी के 14 सदस्य हैं जबकि भाजपा को 74 सदस्यों का समर्थन प्राप्त है. विधानसभा में भाजपा के 61 सदस्य हैं और उसे बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट के 12 विधायकों और एक निर्दलीय विधायक का समर्थन प्राप्त है. राज्य में एजीपी के तीन मंत्री हैं, लेकिन उन्होंने अभी इस्तीफा नहीं दिया है. हालांकि समर्थन वापसी का राज्य में बीजेपी सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

बीजेपी की सहयोगी शिवसेना भी नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध कर रही है. पार्टी नेता संजय राउत का कहना है कि असम गण परिषद ने शिवसेना से इस कानून का विरोध करने की अपील की थी, जिसके बाद विरोध का फैसला लिया गया. उन्होंने बताया कि हम संसद में नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध करेंगे. असम के लोगों ने जाति, धर्म आदि से ऊपर उठकर इस प्रस्तावित कानून का विरोध किया है. शिवसेना का कहना है कि असमी लोगों के सांस्कृतिक, सामाजिक एवं भाषाई पहचान की सुरक्षा के लिए असम संधि में किए गए प्रयासों को इस प्रस्तावित कानून से ठेस पहुंचेगा. राउत ने कहा कि यदि यह विधेयक पारित हो गया तो सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की पूरी प्रक्रिया निरर्थक हो जाएगी.

क्या है नागरिकता संशोधन विधेयक
बीजेपी ने 2014 के अपने चुनावी वादे के अनुसार नागरिकता संशोधन विधेयक को संसद में पेश करने का एलान किया है. केंद्रीय मंत्रिमंडल ने फिर से तैयार किए गए नागरिकता संशोधन विधेयक को सोमवार को ही मंजूरी दी थी. यह विधेयक बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के गैर मुस्लिमों को भारत की नागरिकता देने के लिए लाया गया है.

नागरिकता अधिनियम, 1955 में संशोधन के लिए यह विधेयक लाया जा रहा है. विधेयक में अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से भारत आए अल्पसंख्यक समुदाय के ऐसे लोगों को 12 साल की बजाय भारत में छह वर्ष निवास करने के बाद ही नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान किया गया है. ऐसे लोगों के पास कोई उचित दस्तावेज नहीं होने पर भी उन्हें नागरिकता दी जा सकेगी. अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोग अल्पसंख्यक हैं. यह विधेयक धार्मिक अत्याचार की वजह से भागकर 31 दिसंबर 2014 तक भारत में प्रवेश करने वाले हिन्दू, सिख, बौद्ध जैन, पारसी और ईसाई धर्म के लोगों को नागरिकता प्रदान करेगा.