भोपाल: लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में कांग्रेस की करारी हार के बाद भाजपा के हमलावर होने पर मुख्यमंत्री कमलनाथ ने किसी भी विषम परिस्थिति से निपटने के लिए एक नायाब फार्मूला निकाला है. इसके तहत एक-एक मंत्री को जिम्मेदारी दी गई है कि वह पांच-पांच विधायकों को संभाले और उसकी शिकायतों और समस्याओं पर गौर करे, ताकि विधायकों में किसी तरह का असंतोष न पनपे. बता दें कि बीजेपी द्वारा यहां लगातार कहा जा रहा है कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार जल्दी ही गिर जाएगी. 230 सदस्यीय राज्य विधानसभा में कांग्रेस के 114 और भाजपा के 109 विधायक हैं. कांग्रेस की सरकार बसपा के दो, सपा का एक और निर्दलीय चार विधायकों के समर्थन से बनी है. भाजपा की नजर निर्दलीय, बसपा और सपा के विधायकों पर है.

सूत्रों के अनुसार, कमलनाथ ने रविवार रात विधायकों की बैठक बुलाई. बैठक में उन्होंने सभी विधायकों से एकजुट रहने के साथ ही उनकी समस्याओं के त्वरित निराकरण के लिए तय समय सीमा में कार्रवाई करने का मंत्रियों को निर्देश दिए. मुख्यमंत्री ने राज्य सरकार के एक-एक मंत्री को पांच-पांच विधायकों की समस्याओं और उनके द्वारा उठाए जाने वाले मसलों के त्वरित निराकरण के निर्देश दिए. जबकि निर्दलीय और सपा, बसपा विधायकों से मुख्यमंत्री सीधे संपर्क में रहेंगे.

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इसका लाभ यह होगा कि विधायकों में असंतोष नहीं पनपेगा और अगर सरकार पर किसी तरह का संकट आता है तो मंत्रियों के जरिए मुख्यमंत्री तक सारी जानकारी पहुंच जाएगी और विधायक को संतुष्ट करना और संभालना आसान होगा. राज्य सरकार के मंत्री सुखदेव पांसे ने सीधे तौर पर पांच विधायकों की जिम्मेदारी एक मंत्री को दिए जाने की बात तो नहीं स्वीकारी, लेकिन उन्होंने कहा, “विधायकों द्वारा उठाए गए विषयों का त्वरित गति से निपटारा किया जाएगा.” इसी तरह गृहमंत्री बाला बच्चन ने कहा है कि “हर क्षेत्र का विधायक भी अपने क्षेत्र के मंत्री और मुख्यमंत्री की तरह है. इसलिए उसके क्षेत्र में उसके मुताबिक विकास के कार्य समय पर होने चाहिए.”

सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस विधायकों ने रविवार रात मुख्यमंत्री की मौजूदगी में हुई बैठक में एकजुटता दिखाई. इसके पीछे पिछले कुछ दिनों से बनी स्थितियों को माना जा रहा है. दरअसल, राज्य के नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव राज्यपाल को पत्र लिखकर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की मांग कर चुके हैं. वह सरकार के भविष्य पर लगातार सवाल उठा रहे हैं. इसके अलावा भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष राकेश सिंह नैतिकता के आधार पर मुख्यमंत्री से इस्तीफा मांग चुके हैं.

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कमलनाथ के करीबियों का कहना है कि सरकार बनने के बाद ही मंत्रियों को पांच-पांच विधायकों से संपर्क में रहने के निर्देश दिए गए थे, मगर मंत्रियों ने उसे गंभीरता से नहीं लिया. लिहाजा मुख्यमंत्री कमलनाथ ने मंत्रियों को साफ तौर पर निर्देश दे दिए हैं कि वे अपने विभाग से संबंधित विधायकों की समस्याओं के निपटारे में लापरवाही न बरतें. राज्य में मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व वाली सरकार बसपा, सपा और निर्दलीय विधायकों के समर्थन से चल रही है. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी हार मिलने के बाद सरकार के अस्थिर होने के कयास लगाए जाने लगे हैं. खबर थी कि कांग्रेस के कुछ विधायक भाजपा के संपर्क में हैं.

कई विधायक भाजपा की ओर से प्रलोभन मिलने के आरोप भी लगा चुके हैं. दमोह जिले की पथरिया विधानसभा सीट से बसपा विधायक राम बाई ने सोमवार को आरोप लगाया कि उन्हें भाजपा की ओर से 50 करोड़ रुपये और मंत्री पद की पेशकश की गई है, लेकिन वह कमलनाथ सरकार के साथ हैं. 230 सदस्यीय राज्य विधानसभा में कांग्रेस के 114 और भाजपा के 109 विधायक हैं. कांग्रेस की सरकार बसपा के दो, सपा का एक और निर्दलीय चार विधायकों के समर्थन से बनी है. भाजपा की नजर निर्दलीय, बसपा और सपा के विधायकों पर है.

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इनपुट: आईएएनएस