कश्मीर के कुपवाड़ा में बिना किसी डर के और भय के दुश्मनों के दांत को खट्टा करने के लिए देश के इस सच्चे सपूत ने ऐसा काम किया। जिसपर हर भारतीय को गर्व और नाज है। भले ही आज कर्नल संतोष महाडिक हमारे बीच में नही हैं लेकिन उनकी वीरता की गाथा पूरी दुनिया गा रही है। इस धरती माँ के सच्चे सपूत को तकरीबन 2 बजे के करीब सर में उस वक्त गोली लगी जब वो जंगल में छिपे आतंकवादियों के सफाई का काम कर रहें थे। शहीद हुए 41 राष्ट्रीय राइफल्स के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल संतोष के पार्थिव शारीर को आज उनके सैनिक मित्रों और अधिकारीयों ने नम आँखों से विदाई दी।

शहिद कर्नल संतोष महाडिक महाराष्ट्र में सतारा के रहने वालें थे। इसी महारष्ट्र के जमीन पर पढाई कर उन्होंने यशवंत राव चौहान कॉलेज से स्नातक की डिग्री लिया। संतोष के पिता जी शुरुवाती दौर में दूध बेंच कर अपने परिवार का लालन-पालन किया करते थे। लेकिन संतोष महाडिक के सपने और कुछ थे। जिसे पूरा कनरे के लिए शहिद संतोष महाडिक ने 1998 में भारतीय सेना की स्पेशल फोर्सेज में कमीशन लिया और देश सेवा को चुना और उसके बाद फिर कभी पलटकर नही देखा अपने काम को ईमानदारी और धरती माता के प्रति असीम प्यार को सर्पित कर दिया। कुपवाड़ा में तैनाती के समय इन्हें खबर मिली की कुछ आतंकी जंगल में छिपे बैठे हैं और फिर किया उन आतंकियों को मार गिराने के लिए अपने साथियों के साथ निकल पड़ें। यह भी पढ़ें: भारत पर आतंकी संघठन ISIS की नजर, राज्यों को भेजा गया हाई अलर्ट

जंगल में आतंकियों के सर्च ऑपरेशन के दौरान तकरीबन दोपहर के ढाई बजे के करीब एक गोली उनके सर पर लगी और उनके 4 साथी भी घायल हो गए। फीर सभी को इलाज के लिए अस्पताल में लेकर जाया गया लेकिन इस भारत माता के सच्चे सपूत को बचाया नही जा सका। कर्नल संतोष महाडिक के काम और उनकी लगन को देखते हुए उन्हें सेना में 1998 में कमीशन हुए कर्नल संतोष को उत्तरपूर्व में एक ऑपरेशन में सेना मेडल भी मिल चुका है। आज संतोष महाडिक के बाद उनके परिवार में उनकी पत्नी और दो बच्चें हैं और कर्नल संतोष के लेकिन उनकी वीरता और धरती माता के लिए किए लिए उनकी क़ुरबानी को सदैव लोगो के जहन में रहेगा। भारत माँ के इस सच्चे सपूत को हमारा सलाम।