गांव में मेहरारू लोग के लड़ाई-झगड़ा तऽ रोज के बात हऽ. बाकिर अगर धेयान से देखल जाव तऽ साड़ी आ बाड़ी (घर) के झगड़ा बड़ा जबर होला. एक-दोसरा के एक से एक कटाह गारी देबे में मेहरारू लोग में कंपीटिशन लागेला. भतरा काटो… मुंहझउंसा, उफ्फर परना, मुड़ीअईंठवना जइसन गाली सुनके कान में से धूंआ निकले लागेला. ई लोग खाली गालिये ना देबे लोग, किसिम-किसिम मुंह बनाके भी एक-दोसरा के चिढ़ावे ला लोग. Also Read - Google ने खोला गहरा राज, सेल्फी में सुंदर दिखने के लिए क्या-क्या करती हैं भारतीय महिलाएं..

अइसन बात नइखे कि गांव में सब झगड़ा साड़ी आ बाड़ी खातिर ही होला. झगड़ा तऽ मूड आ फूरसत पर डिपेंड करेला. मूड ठीक बा तऽ कतनो भारी बात हो जाव, केहू कुछ ना बोली. बाकिर अगर फूरसत बा तऽ बिना बात के कुटंबस हो जाई. उघटा-पुराण में गांव के मेहरारू सब के महारत हासिल होला. जेकरा पर भीड़ गइली सऽ ओकर तऽ कल्याण समझीं. एक बेर भूलन काका भी एह फेर में पड़ल रहले. Also Read - ICC Women's T20 World Cup: लीग की हार का बदला फाइनल जीतकर लिया

भूलन काका!
हां जी हां!
भूलन काका!
चिहुंकी मत! रउरा एही से नू चिहुंकतानी कि भूलन काका मेहरारू सब के फेर में कइसे पड़ गइल रहले. तऽ सुनीं इ बात ढेर पुरान ना ह. थोड़ही दिन पहिले के बात हऽ.
बटेसर अपना मेहरारू के साथे कहीं जात रहले. भूलन काका नहर पर दूनों बेकत के देखले तऽ पूछ लेहले कि का हो सबेरे-सबेरे कहां दूनो जाना जात बाड़ऽ लोग. कवनो खास बा का. बटेसर तऽ मुस्की मार के रह गइले बाकिर बटेसर ब पिनपिना गइली. ‘का ऐ भूलन काका! रउरा तऽ मरद-मानुष हईं, तनी इनका के काहें नइखीं समझावत.’
‘का भइल, बताव तऽ पहिले.’ भूलन काका बटेसर ब से कहले.
बटेसर ब हाथ में मोटरी जमीन पर रखके झनके-पटके लगली. भूलन काका से ना रहाइल तऽ कहले- ‘कुछ कहबो करबू कि खाली झनकबू-पटकबू.’
बटेसर ब अपना मरद के ओर कनखी से देखत कहली ‘का कहीं ऐ काका! रउरा से अब का छुपल बा. चार दिन बाद गोतनी के बेटा के शादी बा. कब से कहतानी कि दू गो बढ़िया साड़ी खरीद दऽ. बाकिर इनका टाइमे नइखे मिलत. आज हमहू ठान लेनिह कि जबे साड़ी खरीदायी तबे घर में चुल्हा बराई. जातानी सऽ एकमा बाजार साड़ी खरीदे.’
हो हो हो करके हंसत भूलन काका चुपचाप उहां से इ कहत चल देहले कि ‘ठीक बा जाईं लोगन.’
बाकिर भूलन ब काका के हंसला पर खिसिया गइली. उनका लागल कि काका उनकर मजाक उड़ाव तारे. ओहि दिन त बात आइल-गइल हो गइल बाकिर दोसरा दिन ओहि नहर पर अपना टोला के चार गो मेहरारू संगे बटेसर ब काका के घेर लेहली ‘का हो ककऊ! तहरा साड़ी के बात मजाक लागेला. कहियो जिनगी में साड़ी केहू खातिर खरीदले बाड़ऽ कि ना.’
भूलन काका इ बात सुन के अकबका गइले. उनका ना बुझाइल कि बटेसर ब अइसन बात काहें कहतारी. उ चुपचाप उनका के खाली निहारत रहले. जब मेहरारू लोग के दल उहां से चल गइल तऽ नहर पर गाछ के लगे जाके बइठ गइले. हर बात पर हाजिरजवाबी भूलन काका के ऐह बात के कवनो ओर-छोर ना बुझात रहे. थोड़ही देर में बटेसर मुड़ी पर घास लेले आ गइले ‘काका काहें मुंह लटका के एहिजा बइठल बानीं.’
‘का कहीं ऐ बटेसर भाई. तहार मेहरारू तऽ आज हमार बोलती बंद कर देहली.’ भूलन काका के बात सुन के बटेसर मुस्किया के कहले ‘जाये दीं काका जी. रउरा तऽ समझदार हईं. ऐह छोट-छोट बात पर मन काहें खराब करतानी. साड़ी आ बाड़ी के बात में मेहरारू सब केहू के ना सुनेली सऽ.चलीं अब घरे चलीं. सांझ हो गइल.’ भूलन काका उठ के बटेसर के साथे चल दिहले. Also Read - एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स के लिए इस उम्र के पुरुषों को पसंद करती हैं भारतीय महिलाएं, जानिए ये चौंकाने वाले खुलासे

लेखिका : चित्रांशी