नई दिल्लीः देश के 19 राज्यों में सत्ता पर काबिज बीजेपी पूर्वोत्तर के राज्यों में भी तेजी से पांव फैला रही है. असम के अलावा पूर्वोत्तर के दो और राज्यों अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में बीजेपी पहले से ही सत्ता में है. अब त्रिपुरा और नगालैंड में सरकार बनाती दिख रही है. बीजेपी की जीत में कभी कांग्रेसी रहे नेताओं का भी बड़ा योगदान है. कांग्रेस मुक्त भारत का सपना धीरे-धीरे साकार कर रही बीजेपी को कांग्रेस से भले परहेज हो पर कांग्रेसियों से नहीं है. असम, अरुणाचल और मणिपुर के बाद त्रिपुरा और नगालैंड में भी पुराने कांग्रेसियों ने बीजेपी की ताजा जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. Also Read - यूपी के मंत्री ने कहा- कांग्रेस ने भ्रम फैलाकर पाया वोट, पछता रहे हैं मध्यप्रदेश के लोग

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हेमंत बिस्वा सरमाः ‘गेटवे ऑफ नॉर्थ ईस्ट’
हेमंत बिस्व सरमा ने अगस्त 2015 में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थामा था. बीजेपी ने सरमा को त्रिपुरा चुनाव का प्रभारी बनाया है. पूर्वोत्तर भारत में बहुत कम समय में ही बीजेपी पांव फैलाने में सफल रही. इसके पीछे हेमंत बिस्वा का भी अहम रोल है. वह कभी कांग्रेस के सबसे कद्दावर नेता और असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का दाहिना हाथ माने जाते थे. सरमा को कांग्रेस की कमजोरियों और ताकत दोनों का अंदाजा था. उनको पार्टी में शामिल कर बीजेपी ने कांग्रेस को सांगठनिक रूप से कमजोर करना शुरू किया. सरमा कांग्रेस पार्टी के कुछ नेताओं से नाराज चल रहे थे और उसका फायदा उठाकर बीजेपी ने उन्हें पूर्वोत्तर भारत में अपने तुरुप का इक्का बनाया. भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें पूर्वोत्तर भारत प्रजातांत्रिक गठबंधन का संयोजक भी बनाया है. पूरे पूर्वोत्तर भारत में कांग्रेस की शाख कमजोर करने का श्रेय भी हेमंत को ही जाता है. सरमा ने कहा था कि जब वह राहुल गांधी से मिलने गए थे और असम को लेकर चर्चा करना चाहते थे तो वह अपने कुत्ते को बिस्किट खिलाते रहे. उनके इस बयान ने राजनीति में भूचाल ला दिया था.सरमा का दावा है कि त्रिपुरा में कांग्रेस को बीजेपी ने ही खत्म किया. कांग्रेस के कुछ नेता बीजेपी में शामिल हो गए. टीएमसी के एक विधायक दल का पूरी तरह से बीजेपी में विलय हो गया है. Also Read - एमएनएफ के प्रमुख जोरमथंगा ने ली मिजोरम के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ

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सुदीप रॉय बर्मन
पिछले साल बीजेपी में शामिल हुए सुदीप राय बर्मन त्रिपुरा की राजनीति में कद्दावर चेहरा रहे हैं. वह 1998 से लगातार विधायक हैं. उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस पार्टी से की. वह लंबे समय तक त्रिपुरा में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे. वह पूर्व मुख्यमंत्री समीर रंजन बर्मन के बेटे हैं. इसके बाद वह तृणमूल कांग्रेस में चले गए. वह राज्य विधानसभआ में विपक्ष के नेता भी रहे. बर्मन ने 1993 में पहली बार अगरतला विधानसभा क्षेत्र से विस चुनाव लड़ा था. हालांकि वह पहला चुनाव हार गए थे. इसके बाद वह 1998, 2003 और 2008 में लगातार चुनाव जीते. वर्ष 2016 में वह अपने पांच विधायकों के साथ तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए. दिसंबर 2016 में वह अपनी अजीबोगरीब हरकत को लेकर चर्चा में आए थे. उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष की चांदी की माइक चुरा ली थी. इसके बाद अगस्त 2017 में वह अपने पांचों समर्थक विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए. तृणमूल में तोड़फोड़ मचाने में भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष बिप्लव देव की अहम भूमिका थी.

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नेफियू रियो
तीन बार नगालैंड के मुख्यमंत्री रहे और नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी) के उम्मीदवार नेफियू रियो कोहिमा जिले के उत्तर अंगामी-2 विधानसभा क्षेत्र से निर्विरोध चुने गए. इससे पहले 1998 में वह कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में निर्विरोध निर्वाचित हुए थे, उस वक्त अन्य दलों ने चुनाव का बहिष्कार किया था. बीजेपी को समर्थन देने वाले रियो को राज्य में अगले मुख्यमंत्री के तौर पर देखा जा रहा है. साल 2003 के नगालैंड विधानसभा चुनाव जीतने के बाद रियो पहली बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. इसके बाद रियो ने प्रदेश में जोड़तोड़ और जुगाड़ की राजनीति से कांग्रेस को पूरी तरह ख़त्म कर दिया. रियो ने कांग्रेस से ज़ेलियांग समेत क़रीब सभी बड़े नेताओं को एनपीएफ़ में शामिल कर लिया. इसके बाद से नगालैंड में कांग्रेस कभी उभर नहीं सकी. कांग्रेस जैसी एक राष्ट्रीय पार्टी जो नागालैंड में कई बार सरकार बना चुकी है आज इस मोड़ पर पहुंच गई है कि वह खत्म होने के कगार पर है. प्रदेश में कांग्रेस का सफाया करने वाले रियो ने चार साल संसद में गुजारने के बाद एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए बीजेपी के साथ हाथ मिलाया है.

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एन बीरेन सिंह
मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह राष्ट्रीय स्तर के फुटबॉल खिलाड़ी रह चुके हैं. उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत वर्ष 2002 में क्षेत्रीय पार्टी डेमोक्रेटिक पीपुल्स पार्टी से जुड़कर की. वे राज्य की हेनगांग विधानसभा सीट से विधायक चुने गए. वर्ष 2004 के चुनाव से पूर्व इस पार्टी का विलय कांग्रेस में हो गया था. वे कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार में सतर्कता राज्य मंत्री बनाये गये. 2007 में वे इसी विधानसभा क्षेत्र से पुनः चुने गए और उन्हें सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण, युवा मामले और खेल मंत्री बनाया गया. वर्ष 2012 में वे तीसरी बार अपनी सीट बचाने में सफल रहे लेकिन मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किए जाने के कारण तत्कालीन मुख्यमंत्री इबोबी सिंह से उनके संबंध खराब हो गए. अक्टूबर, 2016 में वे कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए. उन्हें राज्य भाजपा में चुनाव प्रबंधन समिति का प्रवक्ता और सह संयोजक नियुक्त किया गया था. वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भी वह हेनगांग सीट से चुनाव जीते और भाजपा विधायकों ने उन्हें अपने नेता चुना. 15 मार्च 2017 को उनको राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया.

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पेमा खांडू
दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने वाले पेमा खांडू 17 जुलाई 2016 को अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. मुख्यमंत्री बनने के बाद खांडू ने कांग्रेस पार्टी में तोड़फोड़ कर दी और अपनी अगल पार्टी बना ली. कांग्रेस पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही दिन बाद उन्होंने अपनी पार्टी का नाम बदलकर पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल रखा लिया और इसके बाद दिसंबर 2016 में इसका भाजपा में विलय कर लिया. पूर्व मुख्यमंत्री दोरजी खांडू के बेटे पेमा खांडू पूर्व की नबाम टूकी सरकार में अहम मंत्रालय संभाल चुके हैं. ‘खानदानी’ कांग्रेसी खांडू 2005 में यह अरुणाचल प्रदेश के कांग्रेस समिति के सचिव बने. 2010 में यह तवांग जिला कांग्रेस समिति के अध्यक्ष बने. 16 जुलाई 2016 को यह कांग्रेस के विधायक दल के नेता के रूप में चुनाव लड़े थे. पिता के मृत्यु के बाद वह जल संसाधन विकास और पर्यटन मंत्री के रूप में नबाम टूकी की सरकार में शामिल हुए थे.