नई दिल्ली: विवादों में आई निगरानी नीति को लेकर एक बार फिर केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से यह साफ किया गया है कि कंप्यूटर के आंकड़ों की निगरानी और उसे इंटरसेप्ट करने के नियमों में वर्तमान सरकार ने कोई बदलाव नहीं किया. कंप्यूटर के आंकड़ों की निगरानी और उसे इंटरसेप्ट करने के नियम 2009 में बनाए गए थे. उस समय कांग्रेस नीत यूपीए गठबंधन की सरकार थी. सरकार के नए आदेश में उन विशिष्ट एजेंसियों को अधिसूचित किया गया है, जो ऐसी कार्रवाई कर सकते हैं.”

गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने सोमवार को कहा कि संप्रग कार्यकाल के दौरान तैयार निगरानी नीति में कोई बदलाव नहीं किया गया है. केंद्र ने हाल ही में उस नीति को अधिसूचित किया है. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने किसी कंप्यूटर से सूचना प्राप्त करने की खातिर किसी नई एजेंसी को अधिकृत नहीं किया है.

अधिकारी का यह बयान गृह मंत्रालय द्वारा 20 दिसंबर को जारी अधिसूचना पर पैदा विवाद के बाद आया है. विपक्ष का दावा है कि सरकार निगरानी राज्य बनाने की कोशिश कर रही है. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए केंद्र को नोटिस जारी किया और छह सप्ताह के भीतर जवाब देने को कहा.

सरकार के इस कदम को चुनौती देने वाली जनहित याचिका के बारे में पूछे जाने पर अधिकारी ने कहा कि मंत्रालय इस मामले में उच्चतम न्यायालय को तथ्यात्मक स्थिति से अवगत कराएगा.

उन्होंने कहा, ”निगरानी नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है. कंप्यूटर के आंकड़ों की निगरानी और उसे इंटरसेप्ट करने के नियम 2009 में बनाए गए थे, जब कांग्रेस नीत संप्रग सत्ता में था और सरकार के नए आदेश में उन विशिष्ट एजेंसियों को अधिसूचित किया गया है, जो ऐसी कार्रवाई कर सकते हैं.”

अधिकारी ने कहा कि किसी भी एजेंसी को किसी भी कंप्यूटर से सूचना प्राप्त करने के लिए व्यापक अधिकार नहीं दिए गए हैं. अधिकारी के अनुसार 2014 से इंटरसेप्शन की संख्या में खासी कमी आई है. हालांकि देश में मोबाइल फोन कनेक्शनों की संख्या 100 करोड़ से अधिक हो गई है. उन्होंने कहा कि इंटरनेट और फोन सेवाओं का व्यापक प्रसार हुआ है. इसके बाद भी कानूनी रूप से अधिकृत एजेंसियों द्वारा किए गए इंटरसेप्शन की संख्या में खासी गिरावट आई है.

2013 के एक आरटीआई जवाब के अनुसार केंद्र सरकार ने फोन इंटरसेप्शन के लिए हर महीने करीब 7,500-9,000 आदेश जारी किए, जबकि ईमेल के संबंध में यह संख्या 300-500 थी.

गृह मंत्रालय के अधिकारी ने कहा कि अधिसूचना में जिन दस एजेंसियों का जिक्र किया गया है, वे 2011 से ही इलेक्ट्रॉनिक संचार को इंटरसेप्ट करने के लिए अधिकार संपन्न हैं.

इन एजेंसियों में खुफिया ब्यूरो, स्वापक नियंत्रण ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (आय कर विभाग), राजस्व आसूचना निदेशालय, केन्द्रीय जांच ब्यूरो, राष्ट्रीय जांच एजेंसी, रॉ, सिग्नल खुफिया निदेशालय (जम्मू कश्मीर, पूर्वोत्तर और असम में सक्रिय) और दिल्ली पुलिस शामिल हैं.