नई दिल्ली. मिजोरम विधानसभा चुनाव की सभी 40 सीटों के लिए हुए मतदान के नतीजे आ गए हैं. मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) ने 26 सीटें जीतकर जहां प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी होने का तमगा हासिल किया है, वहीं 10 साल से सत्तारूढ़ कांग्रेस महज 5 सीटों पर सिमटकर रह गई है. मिजोरम चुनाव के दो परिणाम चौंकाने वाले हैं. पहला तो भाजपा ने इस राज्य में भी एक सीट जीतकर अपना खाता खोल लिया है. वहीं सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी को चुनाव में उतनी सीटें भी हासिल नहीं हुई हैं, जितना कि राज्य में निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीता है. मिजोरम विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों को 8 सीटों पर जीत हासिल हुई है, जबकि कांग्रेस सिर्फ 5 सीटों तक सिमटकर रह गई है. राज्य के मुख्यमंत्री ललथनहावला का राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंपने से पहले यह कहना, ‘मैंने ZPM (के महत्व को कम कर के आंका’, चुनाव में कांग्रेस पार्टी के अब तक के सबसे खराब प्रदर्शन को साबित करता है.

कांग्रेस-मुक्त हुआ मिजोरम, विद्रोही से नेता बने जोरामथंगा के MNF के हाथ आई सत्ता

इतने कम अंतर से सीएम का हारना, सवाल छोड़ जाता है
देश में मिजोरम के साथ-साथ चार अन्य राज्यों में भी विधानसभा चुनाव हो रहे थे. इनमें से मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो भाजपा पिछले करीब डेढ़ दशकों से शासन में थी. जाहिर है कि चुनाव अभियान के दौरान एंटी इनकंबेंसी फैक्टर पर खूब चर्चाएं होती रहीं. मिजोरम में भी इस फैक्टर का प्रभाव दिखा. लेकिन मुख्यमंत्री ललथनहावला जिस तरीके से चुनाव हारे हैं, उससे कांग्रेस की प्रदेश इकाई की चुनावी रणनीति पर सवाल उठता है. ललथनहावाल इस चुनाव में दो सीटों पर खड़े हुए थे. इन दोनों ही सीटों पर उन्हें हार मिली है, वह भी बहुत कम मतों के अंतर से. मिजोरम विधानसभा चुनाव के लिए जारी मतगणना में कुछ सीटों पर आए परिणामों में मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस उम्मीदवार ललथनहावला ने अपने गढ़ सेरछिप एवं चम्फाई दक्षिण की दोनों सीटें गंवा दी हैं. चुनाव आयोग के सूत्रों ने बताया कि सेरछिप में ललथनहवला को जोराम पीपल्स मूवमेंट (जेडपीएम) के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार लालदुहोमा ने 410 मतों के अंतर से हराया. ललथनहवला को चम्फाई दक्षिण सीट पर मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) के उम्मीदवार एवं राजनीति के नए खिलाड़ी टी जे लालनंतलुआंग ने 1,049 मतों के अंतर से पराजित किया. राज्य के सीएम की यह हार (अन्य राज्यों में एंटी इनकंबेंसी फैक्टर को देखते हुए), कांग्रेस को बहुत खलने वाली है.

MNF को कैसे मिली रिकॉर्डतोड़ सफलता
मिजो नेशनल फ्रंट पिछले 10 वर्षों से सत्ता में वापसी की बाट जोह रहा था. इस दरम्यान राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी ने भाजपा के साथ तो गठजोड़ किया, लेकिन मिजोरम में उसने अपनी स्वतंत्र छवि बरकरार रखी. वर्तमान विधानसभा चुनावों से पहले पूर्वोत्तर के इलाकों में भाजपा की बढ़ती पहुंच की खबरों के बीच भी MNF ने प्रदेश में एनडीए में मिलना स्वीकार नहीं किया. यही वजह रही कि भाजपा और ZPM के मिलने की खबरों और कांग्रेस के मोदी-विरोधी प्रचार के बावजूद मिजो नेशनल फ्रंट, प्रदेश की जनता को यह भरोसा दिलाने में कामयाब रहा कि मिजोरम के भले के लिए सिर्फ वही पार्टी स्वीकार्य है. एमएनएफ के लीडर जोरामथंगा की यह सफलता निश्चित रूप से बड़ी कही जाएगी, क्योंकि वे पिछले 10 वर्षों से राजनीतिक गुमनामी में खोए हुए थे. 2003 से 2008 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहने वाले किसी व्यक्ति के लिए पिछले 10 साल निश्चित रूप से कठिन रहे होंगे. क्योंकि आज जिस तरह ललथनहावला सीएम रहते हुए भी दो सीटों से चुनाव हार गए हैं, ठीक उसी तरह 2008 में जोरामथंगा भी दो-दो सीटों से चुनाव हारे थे. 2013 के विधानसभा चुनाव में भी उनकी हार हुई थी. ऐसी कठिन परिस्थितियों के बाद भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करना जोरामथंगा और उनकी पार्टी, दोनों के लिए सौभाग्य से कम नहीं है.