नई दिल्ली. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव से एक महीने पहले राष्ट्रीय पार्टियों की आमदनी से संबंधित आंकड़ा जारी किया था. इसमें भारतीय जनता पार्टी को सबसे ‘अमीर’ बताते हुए कहा गया था कि इस पार्टी की आय पिछले वित्तीय वर्षों में 81 प्रतिशत बढ़ गई है. वहीं, विपक्षी कांग्रेस इसी अवधि के दौरान ‘गरीब’ हो गई है. एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार 81.18 प्रतिशत की बढ़ोतरी के बाद भाजपा की आमदनी जहां 1034.27 करोड़ रुपए पर पहुंच गई थी, वहीं कांग्रेस की आमदनी में 14 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी. कांग्रेस की आमदनी 225.36 करोड़ रुपए बताई गई थी. भाजपा और कांग्रेस के बीच आर्थिक असमानता का यह दायरा दोनों दलों की राजनीतिक सेहत से जुड़ा है. क्योंकि आर्थिक तंगी से जूझ रही कांग्रेस पार्टी के लिए ‘अमीर’ भाजपा से संघर्ष करना आसान नहीं है. तंगहाली का आलम यह है कि कांग्रेस हाईकमान पिछले 5 महीनों से प्रदेश कार्यालयों को फंड नहीं भेज सका है.

2 साल में 81 प्रतिशत ‘अमीर’ हुई भाजपा, कांग्रेस की आय में 14 फीसदी की गिरावट

प्रदेश कार्यालय चलाने के लिए फंड नहीं
राहुल गांधी के पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद राजनैतिक स्तर पर भले ही कांग्रेस की प्रदेश इकाइयों और कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा हो, लेकिन आर्थिक तंगी उनकी धार को ‘कुंद’ कर रही है. आलाकमान ने पैसों की कमी के मद्देनजर प्रदेश इकाइयों को निर्देश दिया है कि वह अपने खर्च में कटौती करें और पार्टी के लिए फंड जुटाने के उपाय तलाशें. इकोनॉमिक टाइम्स में छपी खबर के अनुसार संकट से पार्टी को उबारने के लिए कांग्रेस नेता इलेक्टोरल बॉन्ड्स और ‘क्राउड-फंडिंग’ जैसे उपायों पर विचार कर रहे हैं. कांग्रेस का सोशल मीडिया विभाग संभाल रहीं नेता दिव्या स्पंदना ने अखबार से बातचीत करते हुए स्पष्ट तौर पर कहा, ‘हमारे पास पैसे नहीं हैं. पार्टी को बड़ी तादाद में इलेक्टोरल बॉन्ड भी नहीं मिले हैं जिससे कि उसका अर्थ-भंडार बढ़े. इसीलिए पार्टी अब ऑनलाइन क्राउड-फंडिंग के जरिए इस संकट से निपटने का उपाय तलाश रही है.’

सपा देश की सबसे अमीर क्षेत्रीय पार्टी

प्रदेश कार्यालयों में चाय-पानी तक पर आफत
एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार कांग्रेस की आमदनी मार्च 2017 में समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में भाजपा के मुकाबले महज एक चौथाई ही रही थी. भाजपा ने इस अवधि में जहां 10 अरब से ज्यादा की आय दिखाई है, वहीं कांग्रेस की आय इस अवधि में सिर्फ सवा 2 अरब तक सिमटकर रह गई है. कांग्रेस की आय में यह गिरावट 14 प्रतिशत तक दर्ज की गई है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने इकोनॉमिक टाइम्स को नाम न छापने की शर्त पर बताया कि आर्थिक संकट के कारण ही पिछले साल हुए उत्तर-पूर्व के तीन राज्यों के चुनाव में पार्टी का चुनाव अभियान प्रभावित हुआ. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता फ्लाइट की टिकट के लिए इंतजार करते रह गए, लेकिन वे इन राज्यों में चुनाव प्रचार के लिए नहीं पहुंच सके. आर्थिक तंगी ही वह वजह है जिसके कारण पार्टी की प्रदेश इकाइयों में अतिथियों के लिए चाय-पानी तक के खर्चे में कटौती कर दी गई है. साथ ही प्रदेश के नेताओं के दौरों में भी कमी आ गई है.

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2014 के लोकसभा चुनाव से ही दिखने लगा था संकट
कांग्रेस पार्टी में व्याप्त आर्थिक संकट वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के समय से ही दिखने लगा था. एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जहां चुनावी चंदों के जरिए 5 अरब रुपए से ज्यादा की राशि जुटाई थी, वहीं कांग्रेस के हिस्से में साढ़े 3 अरब रुपए ही आ पाए थे. पार्टी के लिए यह संकट उसकी कई परेशानियों का कारण बनता जा रहा है. यह न सिर्फ चुनाव अभियानों पर असर डाल रहा है, बल्कि फंड की कमी पार्टी कार्यालयों का खर्च निकालने में भी आड़े आ रही है. पार्टी के वरिष्ठ नेता ने अखबार को बताया कि पैसों की कमी के कारण ही कांग्रेस का दिल्ली में नया कार्यालय भवन बनाने का काम लंबित है. वहीं, भाजपा ने केंद्र में सरकार बनाने के बाद अपना आलीशान दफ्तर खड़ा कर लिया है. राजनीतिक विश्लेषक पार्टी की इस आर्थिक तंगी को सीधे चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं. एडीआर के संस्थापक और इसके ट्रस्टी जगदीप छोकर ने इकोनॉमिक टाइम्स से बात करते हुए कहा, ‘आज की तारीख में यदि किसी पार्टी के पास पैसे नहीं हैं तो उसका चुनाव लड़ना मुश्किल है.’ भारतीय राजनीति की समझ रखने वाले एक अन्य जानकार अजय बोस ने अखबार से कहा, ‘यदि कांग्रेस का आर्थिक संकट बना रहा तो 2019 के लोकसभा चुनाव में जनता एक अमीर और हाई-फाई पार्टी के खिलाफ सामान्य रूप से और जमीनी स्तर पर संघर्ष करने वाली पार्टियों के बीच की चुनावी लड़ाई देखेगी.’