बेंगलुरू: ये मेरा आखिरी चुनाव है, मैं दो सीटों से चुनाव लड़ूंगा, मैं अपनी परंपरागत सीट से बेटे को चुनाव लड़ाउंगा, मैं पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ मानहानि का मुकदमा करूंगा, मैं ट्विटर पर बीजेपी की ऑनलाइन सेना का मुकाबला करूंगा और कर्नाटक में फिर से कांग्रेस पार्टी की ही सरकार बनेगी. ये सारे बयान कर्नाटक के पूर्व मुख्‍यमंत्री एस सिद्धारमैया के हैं और मंगलवार को चुनाव के नतीजे आने से पहले तक ये बयान कांग्रेस आलाकमान के लिए संजीवनी बने हुए थे. 2014 के बाद शुरू हुआ चुनावी हारों का सिलसिला इन बयानों से रुकने की उम्‍मीद थी, लेकिन नतीजे उम्‍मीदों के मुताबिक नहीं आए तो पार्टी ने अक्‍सर उनके बयानों के निशाने पर रहने वाली जेडीएस से गठबंधन तो किया ही, पार्टी के लिए वे अछूत होकर रह गए. हालांकि, फिलहाल वे राज्‍य के कार्यवाहक मुख्‍यमंत्री हैं और पार्टी की रणनीतियों में उनका चेहरा अब भी दिख रहा है, लेकिन इसमें कोई नहीं कि राज्‍य में नई सरकार चाहे जिस पार्टी की बने, सिद्धारमैया के लिए कांग्रेस में अब भविष्‍य की संभावनाएं करीब-करीब खत्‍म हो गई हैं.

ये कैसी रणनीति
इसके कारण भी हैं. कांग्रेस के हालिया इतिहास में कम ही ऐसा देखने को मिला है जब पार्टी ने प्रचार अभियान के दौरान अपने सीएम उम्‍मीदवार की घोषणा की हो. चुनावों के लिए उम्‍मीदवारों के चयन से लेकर रणनीति तैयार करने की जितनी छूट सिद्धारमैया को मिली थी, उसके उदाहरण भी कम ही देखने को मिलते हैं. लेकिन सिद्धारमैया इसका फायदा नहीं उठा सके. इसके बूते वे अपने आपसी रंजिशों को निपटाते रहे, अपने बेटे को विधानसभा चुनाव की उम्‍मीदवारी दिलाने के तिकड़म में लगे रहे. उन्‍होंने चामुंडेश्‍वरी सीट पर अपने खिलाफ खड़े जी टी देवगौड़ा के खिलाफ भ्रष्‍टाचार निरोधक इकाई को लगा दिया. ये फैसला उन्‍होंने तब लिया जब यह स्‍पष्‍ट हो चुका था कि देवगौड़ा उनके खिलाफ उम्‍मीदवार होंगे. उन्‍होंने पूर्व पीएम और जेडीएस के नेता एचडी देवगौड़ा को बेइज्‍जत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. जेडीएस को बीजेपी की बी टीम कहने का उनका असल मकसद यह था कि इससे उसके कांग्रेस के नजदीक आने की संभावनाएं कम होंगी.

अपनी पार्टी के नेताओं को भी नहीं देते थे तवज्‍जो
सिद्धारमैया ने प्रचार के दौरान जो रणनीति अपनाई, वह भी कारगर साबित नहीं हुई. लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा देने के उनके प्रस्‍ताव को पहले पॉलिटिकल मास्‍टरस्‍ट्रोक माना गया, लेकिन मतदाताओं ने इसे समाज को बांटने वाला माना. उनहोंने उत्‍तर-दक्षिण भारत के बीच अंतर को बीजेपी के भेदभाव के रूप में पेश किया, लेकिन इसका नतीजा भी उल्‍टा रहा. पांच साल के शासनकाल में सिद्धारमैया की छवि वोकालिग्‍गा और दलित विरोधी की रही. जी परमेश्‍वर को अपने कैबिनेट में शामिल नहीं कर उन्‍होंने ऐसी धारणा को और मजबूत होने दिया. दलित नेता श्रीनिवास प्रसाद के बाहर होने से ऐसी धारणा बनी कि वे विरोधियों को तवज्‍जो नहीं देते. 2015 की शुरुआत में जब उनकी जगह किसी दलित को मुख्‍यमंत्री बनाने की मांग हो रही थी तो उन्‍होंने कहा था कि वे खुद भी दलित ही हैं क्‍योंकि उनका ताल्‍लुक भी समाज के कमजोर तबके से है.

हारने के बाद पार्टी में हाशिये पर
चुनाव अभियान के दौरान कांग्रेस ने उन्‍हें रणनीति बनाने की पूरी छूट दी, क्‍योंकि पार्टी के पास और कोई विकल्‍प भी नहीं था. लेकिन नतीजे आने पर जैसे ही अंदाजा हुआ कि पार्टी के हाथों से सत्‍ता निकल सकती है तो कांग्रेस उन्‍हीं देवगौड़ा के दरवाजे पर माथा टेकना पड़ा, जिनका सिद्धारमैया पूरे चुनाव अभियान में मजाक उड़ाते रहे. कांग्रेस की यह राजनीतिक मजबूरी है. बीजेपी को सत्‍ता से दूर रखने के लिए उसके पास यही एक विकल्‍प है और यही सिद्धारमैया की गिरती राजनीतिक हैसियत का सूचक भी है. पार्टी नेता उन्‍हें चुनाव में हार के लिए जिम्‍मेदार बता रहे हैं. उनकी कैबिनेट में ऊर्जा मंत्री रहे डी के शिवकुमार ने कह दिया है कि सिद्धारमैया का अति आत्‍मविश्‍वास ही हार का कारण है. अभी ऐसे बयान ओर सुनने को मिलेंगे. 2006 में जेडीएस छोड़ कांग्रेस में शामिल हुए सिद्धा अब कांग्रेस ही नहीं, अपनी पुरानी पार्टी के लिए भी कहीं अछूत बनकर ही न रह जाएं.