नई दिल्ली: कांग्रेस ने ‘इंफ्रास्ट्रक्चर, लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड’ (आईएलएफएस) नामक कंपनी पर ‘91 हजार करोड़ रुपये का कर्ज होने’ के मामले में बुधवार को नरेंद्र मोदी सरकार पर आम भारतीय नागरिकों के निवेश को दांव पर लगाने का आरोप लगाया. कांग्रेस ने कहा कि कुछ विदेशी निवेशकों के निवेश को सुरक्षित रखने के लिए सरकार का उनके साथ ‘महागठबंधन’ है. पार्टी ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग भी की है.

पार्टी प्रवक्ता मनीष तिवारी ने संवाददाताओं से कहा कि कुछ विदेशी निवेशकों का पैसा बचाने के लिए आम भारतीय नागरिकों के पैसे का इस्तेमाल किया जा रहा है. उन्होंने साथ ही सरकार से यह सवाल किया कि एलआईसी एवं एसबीआई जैसे सरकारी उपक्रमों की हिस्सेदारी वाली इस कंपनी का कर्ज इतना ज्यादा कैसे बढ़ा?

अमेरिका के 2008 के लेहमैन ब्रदर्स मामले का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘आईएलएफएस में एसबीआई, एलआईसी, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और जापान एवं यूएई के दो विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी है. हैरानी की बात यह है कि यह इकाई बाजार में सूचीबद्ध नहीं है.’’ उन्होंने कहा, ‘‘31 मार्च 2018 तक इस कंपनी पर 91 हजार करोड़ रुपये का बकाया था. यह बकाया बैंकों, सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों और दूसरे निवेशकों का था. इसमें से 74590 करोड़ रुपये का कर्ज इसकी सब्सिडियरी कंपनियों की वजह से है. इस कंपनी का 71 फीसदी लेनदेन ‘रिलेटेड पार्टी ट्रांजेक्शन’ है. रिलेटेड पार्टी ट्रांजेक्शन गैरकानूनी नहीं है, लेकिन इसके लिए गहरी कानूनी छानबीन होती है.’’

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तिवारी ने कहा, ‘‘31 मार्च, 2018 तक आईएलएफएस की नेटवर्थ 5428 करोड़ रुपये थी. इसका मतलब यह है कि इस कंपनी के पास कर्ज के ब्याज की अदायगी और दूसरी जरूरतों के लिए पर्याप्त धन नहीं था.’’ उन्होंने कहा, ‘‘वित्तीय जानकारों का मानना है कि 91 हजार करोड़ रुपये में से 57 हजार करोड़ रुपये पहले ही एनपीए हो चुके हैं. यह कहानी माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चोकसी के मामलों से भी कहीं बड़ी है.’’

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कांग्रेस नेता ने सवाल किया एक कंपनी की 40 फीसदी हिस्सेदारी एलआईसी, एसबीआई एवं कुछ दूसरे सरकारी उपक्रमों के पास है, फिर उसकी यह स्थिति क्यों हुई? उन्होंने दावा किया, ‘‘प्रधानमंत्री कार्यालय और वित्त मंत्रालय अब रिजर्व बैंक, एलआईसी, एसबीआई और एनएचएआई पर दबाव डाल रहे हैं कि वे इस कंपनी को प्रोत्साहन पैकेज दें. इस कंपनी में 35 फीसदी हिस्सेदारी विदेशी निवेशकों के पास है. आम लोगों के निवेश के पैसे का इस्तेमाल बाहरी निवेशकों की मदद के लिए किया जा रहा है.’’

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तिवारी ने कहा, ‘‘प्रधानमंत्री जी विदेशी महागठबंधन की बात कर रहे थे, लेकिन ये है असली महागठबंधन.’’ तिवारी ने कहा, ‘‘ इससे जुड़े मामले की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच होनी चाहिए. यह पता किया जाना चाहिए कि देश के लोगों का इतना पैसा कैसे दांव पर लगा है?’’ उन्होंने कहा कि वित्त मंत्री और वित्त मंत्रालय को जवाब देना चाहिए कि कंपनी के बोर्ड में कौन लोग थे और इसका कर्ज इतना ज्यादा क्यों बढ़ गया?