Covid-19 Latest News Updates: देश में कोरोना वायरस महामारी से हालात भयावह हैं. संक्रमण रोज सैकड़ों लोगों की जान ले रहा है. इससे दाह संस्कार कर रहे श्मशान घाट भी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं. कई श्मशान घाट में दूसरे क्षेत्र से शवों का दाह संस्कार कराने आए परिजनों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा है. ऐसा ही एक मामला यूपी में नोएडा के सेक्टर 94 का है. यहां अंतिम निवास (Noida Antim Niwas) श्मशान घाट के गेट पर एक नोटिस चिपकाया गया है. नोटिस में कहा गया- ग्रेटर नोएडा के शवों का यहां अंतिम संस्कार नहीं किया जा सकता है. द इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया- कि रात साढ़े आठ बजे तक श्मशान घाट में 21 चिताएं जल रही थीं.Also Read - The Kashmir Files पर प्रतिबंध लगाने की मांग, मित्र मंच ने कहा- छोटे बच्चों में नफरत फैला रही फिल्म

इसी समय पास में ही सीएनजी चैंबर के ऑपरेटर दीपक कुमार सांस लेने के लिए बाहर निकलते हैं. यहां दोनों मशीनों में दाह संस्कार चल रहा है. अभी चार शवों का और अंतिम संस्कार किया जाना है जो एंबुलेंस में हैं. कुमार कहते हैं, ‘मैं कई दिनों से 16 घंटे काम कर रहा हूं. सिर्फ तीन-चार घंटे सो पा रहा हूं.’ Also Read - भारत में हर साल पांच लाख सड़क दुर्घटनाओं में 1.5 लाख लोगों की मौत, 3 लाख से ज्यादा गंभीर घायल- बोले नितिन गडकरी

अखबार लिखता है कि दाह संस्कार में जुटे 29 वर्षीय कुमार ने पीपीई सूट नहीं पहना है. वो कहते हैं- हां, ये जोखिम भरा है, ये मैं जानता हूं. मगर जो काम मैं करता हूं उसे पीपीई सूट पहनकर करना असंभव है. गर्मी सूट को सिकुड़ा देती है और ये हमारी खाल से चिपक जाती है. हम पीपीई पहनकर ना तो लकड़ी के दाह संस्कार और ना ही सीएमजी मशीन के दाह संस्कार में काम कर सकते हैं. Also Read - Karnataka Local Body Elections: कर्नाटक निकाय चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, बीजेपी को बड़ा झटका

श्मशान घाट के कर्मचारियों को दिन 16 घंटे क्यों काम करना पड़ रहा है?
इस सवाल पर कुमार के सहयोगी महेश पांडे कहते हैं- कोविड-19 महामारी से पहले, दिन में प्रतिदिन करीब 3-4 शव सीएनजी दाह संस्कार के लिए आते थे. इनमें लावरिश और अज्ञात शव भी शामिल हैं जो पुलिस भेजती थी. मगर अब प्रतिदिन 18-20 शव आ रहे हैं. हम में से दो हैं जो सीएनजी मशीनों का संचालन करते हैं.

क्या उन्हें अतिरिक्त काम के घंटों के लिए अधिक वेतन मिल रहा है?
सवाल पर कुमार कहते हैं कि अभी तक तो कुछ नहीं मिला. हमें अपना सामान्य वेतन 12,000 प्रतिमाह मिल रहा है. नोएडा लोक मंच एनजीओ अंतिम निवास का प्रबंधन देखता हैं. इसने हमें सैनिटाइजर, पीपीई सूट, मास्क आदि चीजें दी हैं. अभी हमें जो जरुरत हैं वो स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance) जैसी चीजों की है. अगर यहां मुझे कुछ हो जाता है तो ये पूरी तरह से मेरे जोखिम पर ही होगा.

मालूम हो कि कुमार औ पांडे दोनों श्मशान घाट परिसर में रहते हैं. इसमें पांडे कहते हैं कि ऐसे समय में घर जाने का कोई सवाल ही नहीं है. जिन शवों का मैं दाह संस्कार करता हूं वो लिपटे हुए होते हैं, मगर मैं हर दिन सैकड़ों लोगों के संपर्क में हूं. इनमें बहुत से हॉस्पिटल से आते हैं, जिनमें एंबुलेंस ड्राइवर भी शामिल हैं. मैं ये नहीं सोचना चाहता कि मैं कितने जोखिम में हूं.

श्मशान घाट में काम कर रहे कर्मचारियों को तत्काल किस सुविधा की जरुरत है?
इस सवाल पर कुमार कहते हैं कि भले ही मुझे एक ग्लास पानी लाना पड़े मगर ठीक दूसरी तक कैंटीन जाना होगा. श्मशान को किस तरह डिजाइन किया गया था. हम पूरे दिन दाह संस्कार के इंतजार में आए शवों से घिरे पड़े रहते हैं. ऐसे में मैं कितनी बार कैंटीन जा सकता हूं? मुझे नहीं लगता कि कभी किसी ने सोचा होगा कि एक श्मशान को इस तरह काम करना होगा.