नई दिल्ली: देश में कोरोना वायरस के प्रकोप से चिंतित सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों को उच्चस्तरीय समितियां गठित करने का निर्देश दिया जो कैदियों की उस श्रेणी का निर्धारण करें, जिन्हें चार से छह सप्ताह के लिए पैरोल पर रिहा किया जा सकता है. Also Read - VIDEO: कोरोना संकट के बीच दिखा ये नजारा, विधायक ने खुलेआम एएसआई के छुए पैर

ऐसे में जिन कैदियों को सात साल की कैद हुई है या जिनके खिलाफ सात साल तक की कैद की सजा के अपराध में अभियोग निर्धारित हो चुके हैं, उन्हें जेलों में भीड़ कम करने के प्रयास में रिहा किया जा सकता है. Also Read - COVID-19: उत्तर प्रदेश में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या 116 हुई

शीर्ष अदालत ने देश की जेलों में क्षमता से ज्यादा कैदी होने की वजह से उनमें कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के इरादे यह निर्देश दिया. शीर्ष ने कहा कि जिन कैदियों को सात साल की कैद हुई है या जिनके खिलाफ सात साल तक की कैद की सजा के अपराध में अभियोग निर्धारित हो चुके हैं, उन्हें जेलों में भीड़ कम करने के प्रयास में रिहा किया जा सकता है. Also Read - Video: निजामुद्दीन मरकज से अस्‍पताल में भर्ती शख्‍स ने 6वीं मंजिल से सुसाइड की कोशिश की

प्रधान न्यायाधीश एस.ए. बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि कैदियों की रिहाई के लिये यह उच्च स्तरीय समिति राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के परामर्श से काम करेगी. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कोरोना वायरस महामारी के प्रकोप के मद्देनजर जेलों में भीड़ कम करने के इरादे से इन कैदियों की रिहाई की जा रही है.

शीर्ष अदालत ने कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए देश की जेलों में क्षमता से कहीं ज्यादा कैदी होने के तथ्य का 16 मार्च को स्वत: संज्ञान लिया था और वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे को इस मामले में न्याय मित्र नियुक्त किया था.