नई दिल्ली: ऐसे कहते हैं न आपदा मनुष्य को लड़ना सिखाती है और लड़ने के लिए इंसान संसाधन तलाशना शुरू कर देता है और जब वो तलाश पूरी नहीं होती है तब इंसान ख़ुद उन संसाधनों के निर्माण की तरफ बढ़ता है. इस वक़्त पूरी दुनिया बहुत बुरे दौर से गुज़र रही है जिसमें भारत भी शामिल है. Also Read - देश के 19 राज्‍यों में कोरोना से ठीक होने वाले मरीजों की दर राष्‍ट्रीय औसत से बेहतर: केंद्र

देश में कोरोना वायरस से अब तक हज़ारों लोग संक्रमित हो चुके हैं और इस महामारी को हराने के लिए सरकार हर संभव प्रयास कर रही है मगर फिर भी यह प्रयास वक़्त के हिसाब से कम है. लेकिन निराशा को भेदते हुए कुछ युवा इंजीनियर इस लड़ाई में उन संसाधनों का निर्माण कर रहे हैं जिससे कोरोना के मरीज़ों को दोबारा ज़िंदगी मिल सकती है. Also Read - Punjab Lockdown Extension News: जमावड़े पर लगी रोक, शादी समारोह में केवल इतने लोग होंगे शामिल

जी हां, पुणे की एक स्टार्टअप कंपनी ने रोगियों को बचाने के लिए कम लागत वाले वेंटिलेटर्स बनाना शुरू किया है. नोक्का रोबोटिक्स नाम की यह कंपनी महज़ दो साल पुरानी है जहां मेकैनिकल, इलेक्ट्रॉनिक और एरोस्पेस इंजीनियर का एक छोटा सा समूह काम करता है. मरीज़ों को कोरोना से  बाहर निकालने के लिए इस समय सबसे ज़्यादा ज़रूरी वेंटिलेटर है जिससे वो सांस ले सकें. मगर मौजूदा आंकड़ों के हिसाब से भारत में फिल्हाल केवल 48 हज़ार वेंटिलेटर मौजूद हैं जो प्रयाप्त नहीं है. ऐसे में देश के विभिन्न आईआईटी से निकले इंजीनियर्स का यह ग्रुप क़रीब 50 हज़ार रुपए के लागत में वेंटिलेटर बना रहा है. Also Read - PM मोदी ने सुंदर पिचाई से की वीसी, गूगल भारत में 10 बिलियन डॉलर का निवेश करेगा

बता दें की जोहन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी की रिसर्च के मुताबिक भारत में 30,000 से 50,000 वेंटिलेटर की आव्यशकता पड़ सकती है. इस कंपनी ने यह अनुमान जताया है कि मई तक 30 हज़ार वेंटिलेटर तैयार कर लिए जाएंगे. इस प्रोजेक्ट के बाहर आने के बाद कई प्रोफेशनल लोग और संस्थान इस मुहीम से जुड़ गए हैं. इन युवा इंजीनियर्स को गूगल सीईओ सुंदर पिचाई ने भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए हिम्मत और शुभकामनाएं दी हैं.