नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बिहार सीएम नीतीश कुमार के विधान परिषद की सदस्यता के अयोग्य घोषित करने के लिए दायर जनहित याचिका को खारिज कर दी. इसमें आरोप लगाया गया था कि नीतीश कुमार ने निर्वाचन आयोग को इस तथ्य की जानकारी नहीं दी थी कि उनके खिलाफ हत्या का एक मामला लंबित है. Also Read - ICAI CA July Exam: सुप्रीम कोर्ट से CA छात्रों को बड़ी राहत, परीक्षा में शामिल न होने पर माना जाएगा Opt Out Case

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर और न्यायमूर्ति धनंजय वाई. चन्द्रचूड़ की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने मुख्यमंत्री के इस कथन पर विचार किया कि उन्होंने 2012 में निर्वाचन आयोग को आपराधिक मामला लंबित होने के तथ्य से अवगत कराया था. Also Read - नीतीश कैबिनेट में कोरोना की एंट्री, मंत्री विनोद कुमार सिंह और उनकी पत्नी कोरोना संक्रमित

पीठ ने कहा, ‘‘ हमें इस याचिका में कोई दम नहीं नजर आया. इसे खारिज किया जाता है. चुनाव के नियम कहते हैं कि उन्हें( नीतीश) निचली अदालत द्वारा संज्ञान लेने के बाद उन्हें इसकी जानकारी देनी चाहिए और ऐसा किया गया था.’’ Also Read - Coronavirus in Bihar Update: बिहार में कोविड-19 के सामने आए 365 नए मामले, नौ हजार के पार हुई संक्रमितों की संख्या

सीएम के वकील ने न्यायालय को सूचित किया कि इस मुकदमे की कार्यवाही पर पटना हाईकोर्ट ने रोक लगा रखी है. यही नहीं, सीएम ने कुछ भी गलत नहीं किया है. यह जनहित याचिका अधिवक्ता मनोहर लाल शर्मा ने दायर की थी. इसमें आरोप लगाया गया था कि जद (यू) नेता के खिलाफ आपराधिक मामला है. इसमें वह एक स्थानीय कांग्रेसी नेता सीताराम सिंह की हत्या करने और चार अन्य को जख्मी करने के आरोपी हैं. यह घटना साल 1991 में बिहार के बाढ़ संसदीय क्षेत्र के लिए हो रहे उपचुनाव के समय की है.

याचिकाकर्ता ने निर्वाचन आयोग के साल 2002 के आदेश के अनुरूप नीतीश कुमार की राज्य विधान परिषद की सदस्यता निरस्त करने की मांग की थी. उनका दावा था कि बिहार के मुख्यमंत्री ने साल 2012 के अलावा साल 2004 से अपने हलफनामे में इस आपराधिक मामले की जानकारी नहीं दी थी.