Supreme Court, SC-ST Act, SC-ST Act Case, civil case, Court, नई दिल्ली: देश के सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सोमवार को कहा कि अगर किसी अदालत को लगता है कि एससी/एसटी अधिनियम (SC/ST Act) के तहत दर्ज कोई अपराध मुख्य रूप से निजी या दीवानी का मामला (matter is private or civil) है या पीड़ित की जाति देखकर नहीं किया गया है, तो वह मामले की सुनवाई निरस्त करने की अपनी शक्ति का प्रयोग कर सकती है.Also Read - Supreme Court On DMRC: सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की DMRC की समीक्षा याचिका, रिलायंस इंफ्रा की याचिका पर 6 दिसंबर को होगी सुनवाई

प्रधान न्यायाधीश एन वी रमण की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, ”अदालतों को इस तथ्य का ध्यान रखना होगा कि उस अधिनियम को संविधान के अनुच्छेद 15, 17 और 21 में निहित संवैधानिक सुरक्षात्मक प्रावधानों के आलोक में बनाया गया था, जिसका उद्देश्य था कमजोर वर्गों के सदस्यों का संरक्षण करना और जाति आधारित प्रताड़ना का शिकार हुए पीड़ितों को राहत और पुनर्वास उपलब्ध कराना.” Also Read - Delhi Pollution: दिल्ली में प्रदूषण के बीच खुले स्कूल, सुप्रीम कोर्ट ने AAP सरकार से किया सवाल

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, ”दूसरी तरफ अगर अदालत को लगता है कि सामने पेश हुए मामले में अपराध, भले ही एससी/एसटी अधिनियम के तहत दर्ज किया गया हो, फिर भी वह मुख्य रूप से निजी या दीवानी प्रकृति का है या जहां कथित अपराध पीड़ित की जाति देखकर नहीं किया गया हो, या जहां कानूनी कार्यवाही कानून प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा, ऐसे मामलों में अदालतें कार्यवाही को समाप्त करने की अपनी शक्ति का प्रयोग कर सकती हैं.” Also Read - SC ने तय कर दी विजय माल्या की सजा की तारीख, कहा- प्रत्यर्पण का और इंतजार नहीं कर सकते

शीर्ष न्यायालय ने यह टिप्पणी, अनुसूचित जाति/जनजाति (प्रताड़ना निवारण) अधिनियम के तहत दोषी करार दिए गए एक व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही समाप्त करने के दौरान की.