नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण का लाभ देने से इंकार करने के लिए क्रीमी लेयर सिद्धांत को नहीं लागू किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि क्या क्रीमी लेयर सिद्धांत लागू करके अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के समृद्ध लोगों को पदोन्नति में आरक्षण देने से इंकार किया जा सकता है.Also Read - Caste Census Update: सुप्रीम कोर्ट में बोली मोदी सरकार- पिछड़े वर्गों की जातिगत जनगणना प्रशासनिक रूप से कठिन है

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केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा-एससी-एसटी कर्मचारी खुद-ब-खुद प्रमोशन में आरक्षण के हकदार Also Read - सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का हलफनामा- कोरोना से हुई मौत पर परिजनों को मिलेगा 50 हजार रुपये का मुआवजा

अटॉर्नी जनरल ने कहा कि पिछड़ेपन और जाति का ठप्पा सदियों से अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के साथ रहा है, भले ही उनमें से कुछ इससे उबर गए हों. आज भी अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के लोग सामाजिक रूप से पिछड़े हुए हैं और उन्हें ऊंची जाति के लोगों से शादी करने एवं घोड़ी पर चढ़ने की इजाजत नहीं होती. अटॉर्नी जनरल ने उच्चतम न्यायालय से कहा कि क्रीमी लेयर अनुसूचित जाति/ जनजाति के लिए लागू नहीं हैं और यह न्यायिक समीक्षा के लिए नहीं है.

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गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 11 जुलाई को 2006 के अपने फैसले के खिलाफ कोई अंतरिम आदेश पारित करने से इनकार कर दिया था और कहा था कि पांच जजों की एक बेंच पहले यह देखेगी कि क्या इसकी सात जजों की बेंच को फिर से विचार करने की जरूरत है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह मामले पर केवल अंतरिम राहत को देखते हुए सुनवाई नहीं कर सकती क्योंकि इस बारे में उल्लेख पहले ही संविधान पीठ में है.

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2006 के एम नागराज फैसले में कहा गया था कि एससी/एसटी को पदोन्नति में आरक्षण तभी दे सकते हैं जब आंकड़ों के आधार पर तय हो कि उनका प्रतिनिधित्व कम है और प्रशासन की मजबूती के लिए ऐसा करना जरूरी है. हालांकि 1992 के इंदिरा साहनी और अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और 2005 के ई वी चिन्नैया बनाम स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश में इस बाबत फैसले दिए गए थे. ये दोनों फैसले ओबीसी वर्ग में क्रीमी लेयर से जुड़े थे.

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गौरतलब है कि कई राज्य सरकारों ने हाईकोर्ट के प्रमोशन में आरक्षण रद्द करने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. उनकी दलील है कि जब राष्ट्रपति ने नोटिफिकेशन के जरिए SC/ST के पिछड़ेपन को निर्धारित किया है, तो इसके बाद पिछड़ेपन को आगे निर्धारित नहीं किया जा सकता. राज्यों व SC/ST एसोसिएशनों ने दलील दी कि क्रीमी लेयर को बाहर रखने का नियम SC/ST पर लागू नहीं होता और सरकारी नौकरी में प्रमोशन दिया जाना चाहिए क्योंकि ये संवैधानिक जरूरत है.