मोबाइल, फेसबुक और अखबार उन बच्‍चों की तस्वीरों से भरे हैं, जिन्‍होंने दसवीं में शानदार प्रदर्शन किया. बधाई ऐसे बच्‍चों के गले का हार बन गई है. मिसाल के लिए हमेशा घर की खिड़की से बाहर झांकते समाज में बच्‍चों की यह कामयाबी जितना उनका भला नहीं करती उससे कहीं अधिक उनका नुकसान करती है.

सफल बच्‍चा उस बच्‍चे से कैसे बेहतर हो सकता है, जो तय समय में रटी/समझी चीजें ठीक से नहीं लिख पाया. यह समझ पाना बहुत मुश्किल है कि कैसे एक कम नंबर पाने वाले बच्‍चे को उस बच्‍चे से कमतर कहा जा सकता है, जिसके नंबर उस बच्‍चे से अधिक आए हैं. बात केवल भारत की नहीं है, दुनिया के तमाम बड़े देश इस बात की गवाही देते हैं कि वहां के इतिहास, विज्ञान, शोध, राजनीति, कला, सिनेमा में जितना योगदान कम नंबर लाने वालों का है, उतना दूसरे किसी का नहीं है.

नोबल पाने वालों की सूची इस बात का दूसरा सबसे बड़ा प्रमाण है कि बच्‍चे केवल स्‍कूल में फेल होते हैं. समस्‍या स्‍कूल की परीक्षा प्रणाली में है, उन बच्‍चों में नहीं, जो वहां कथित रूप से कमतर घोषित किए जाते हैं. यह पोस्‍ट उनके लिए नहीं है, जिनके नंबर बहुत अच्‍छे आए. उनके लिए तो समाज बाहें फैलाए बैठा है. यह उनके लिए है, जिनकी नजरें, कंधे झुके हैं. जो खुद को हारा, टूटा महसूस कर रहे हैं.

साथी पत्रकार पीयूष बबेले ने कितनी खूबसूरत बात लिखी है, ‘CBSE का रिजल्ट आया. कई लोगों ने टॉप किया और बहुत से बच्चों के आशा से कम नंबर आए. जिनके नंबर कम आए, उम्मीद मुझे उन्हीं से है, क्योंकि पिछले 70 साल में टॉपर्स ने देश के लिए क्या किया, इसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता. हां, टॉपर्स ने अपने लिए बहुत कुछ किया, यह मैं बखूबी जानता हूं. इसलिए जिनके कम नंबर आए, उन्हें बहुत बधाई. देश और समाज को उनसे बहुत आशाएं हैं.’

इस बात को थ्‍योरी मत समझिए. न ही इसे ऐसे देखा जाना चाहिए कि अरे इन बातों से कुछ नहीं होता. जिंदगी की दौड़ बड़ी क्रूर है. जानलेवा प्रतिस्‍पर्धा में बच्‍चा कैसे टिकेगा. असल में ऐसा कहते ही हम मनुष्‍य और मनुष्‍यता दोनों पर संदेह के घोड़े दौड़ा देते हैं. दसवीं और बारहवीं की परीक्षा असल में कोई मील का पत्‍थर नहीं है. यह हमारे पुराने, सड़ गल चुके सिस्‍टम की कमी है कि उसे अब तक बच्‍चों की प्रतिभा को सामने लाने का कोई दूसरा तरीका नहीं मिला है.

इसलिए सरकार, समाज और स्‍कूल अपनी पुरानी हो चुकी सोच को बदल नहीं पा रहे हैं. हम दुनिया के उन देशों की ओर नहीं देख रहे हैं, जो आज भी बच्‍चे को सात साल के बाद स्‍कूल भेजने के नियम पर कायम हैं. हम उन अमेरिकन कॉलेजों के बारे में आंख-कान बंद किए हैं, जहां सबसे अधिक समय इस बात पर दिया जाता है कि आपकी रुचि क्‍या है. बेकार की चीजों में समय मत लगाइए, खुद को समझिए.

अंग्रेजों को कितना ही कोसते रहिए कि वह आपको क्‍लर्क बना गए. लेकिन उनको गए तो जमाना बीत गया. पीढ़ियां आईं और चली गईं, लेकिन स्‍कूल वैसे ही रहे. शिक्षा की रेल उसी पटरी पर दौड़ी जो अंग्रेज बिछा गए थे. हमने अपने टैगोर की विश्‍व भारती वाला रास्‍ता नहीं चुना. हमने शिक्षा के बारे में गांधी, बुद्ध और आइंस्‍टाइन की बातें नहीं सुनी. हम बच्‍चों को ढांचा बनाने में लग गए.

आप गमलों में पौधे उगाकर पर्यावरण को नहीं बचा सकते. उसके लिए जंगल चाहिए. ठीक इसी तरह नई, वैज्ञानिक सोच-समझ वाले नजरिए वाला देश बड़ों से नहीं बनेगा. उसका बीज बच्‍चों से तैयार होगा. इसलिए बच्‍चों को मार्कशीट के आधार पर तौलना बंद करना होगा. यह अपने ही खिलाफ किया जा रहा सबसे बड़ा अपराध है.

इसलिए, अपने उन बच्‍चों को जो आज नंबर की होड़ में पिछड़कर आत्‍महत्‍या तक को निकल रहे हैं, संभालिए. समझाइए कि स्‍कूल दुनिया से मिलने का रास्‍ता तो दूर, पगडंडी तक नहीं हैं. हमेशा याद रखिए और दूसरों से साझा करिए, ‘बच्‍चा असफल नहीं होता, असफल स्‍कूल होता है. बच्‍चे हमेशा मंजिल तक पहुंचते हैं, बशर्ते हम उनको बता सकें कि जाना कहां है.’ और यह हमारा ही काम है, बच्‍चों का नहीं.

लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)
(https://twitter.com/dayashankarmi)

(अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें: https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)