नई दिल्ली. आज 23 मार्च है. शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का बलिदान दिवस. आज ही पंजाब के ही क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह संधू ‘पाश’ का भी शहादत दिवस है. 9 सितंबर 1950 को पंजाब के जालंधर जिले के नकोदर तहसील में जन्मे इस कवि ने बचपन से ही कविताएं लिखनी शुरू कर दी थी. पाश ने यूं तो अपनी ज्यादातर रचनाएं पंजाबी भाषा में की हैं, मगर हिन्दी में भी उन्हें वही प्रतिष्ठा हासिल है जो किसी हिन्दी के कवि को मिली है. पाश की एक कविता की पंक्तियां, ‘सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना…’ सबसे ज्यादा चर्चा में रही हैं. यह एक आश्चर्यजनक लेकिन सुखद संयोग ही है कि शहीद भगत सिंह और पाश, दोनों ही पंजाब के थे. दोनों का ही वामपंथी विचार से संबंध था. पाश मूलतः कवि थे, लेकिन उनके लिखे गद्य भी प्रसिद्ध हुए हैं. इनमें भगत सिंह के ऊपर लिखा गया उनका गद्य और कविता भी काफी चर्चित रही है. आज पाश की पुण्यतिथि पर पेश है शहीद भगत सिंह पर लिखा पाश का एक गद्य और 23 मार्च पर लिखी कविता. Also Read - 'इंडिया' शब्‍द हटाकर 'भारत' या 'हिंदुस्तान' करने की पिटीशन पर SC में 2 जून को सुनवाई

Also Read - भारत में जून-जुलाई में तबाही मचा सकता है कोरोना वायरस, अपने चरम पर होगा संक्रमण

भगत सिंह होने का अर्थ Also Read - BRICS समूह के विदेश मंत्रियों की मीटिंग, जयशंकर बोले- कोरोना से जंग में 85 देशों की मदद कर रहा है भारत

दो सदियों तक ‘नरगिस के अपने बेनूरी पर रोने’ के बाद भगत सिंह पैदा हुआ. हमारे युग का फिनामना शायद यही है कि समाज की रूपरेखा, जीवन के दुख-चिंताओं संबंधी सोचने वाले बुद्धिजीवी व उन्हें बदलने के इच्छुक योद्धा केवल मध्यवर्ग में ही पैदा हो सकते हैं. निम्न वर्गों में जीवन की सामान्य चिंताएं ही इतना बोझ डाले रहती हैं कि वे लोग रोजमर्रा की जरूरतों पर सोचने से आगे की सोच की दीवार नहीं पार कर सकते. उच्च धनी वर्ग आरंभिक स्तर पर इतना भ्रष्ट हो चुका है कि उसमें शक्ति ही नहीं रही कि वह ज्ञान की चमक देने वाला कोई गौतम बुद्ध या महावीर जैसा हीरा पैदा कर सके. सामान्य परिस्थितियों में ऐसे हीरे केवल मध्यवर्ग में ही जन्म ले सकते हैं और वह भी ऐसे इंसान जो जवान होने ( जीवन द्वारा आर्थिक स्तर पर कुचल दिए जाने) से पहले ही दिमागी विकास की जड़ें जमा चुके हैं. भगत सिंह सरदार किशन सिंह के घर ही पैदा हो सकता था. कोई खेत मजदूर या सरदार बहादुर उसका पिता नहीं हो सकता था. वह सिर्फ अजीत सिंह का भतीजा हो सकता था, प्रताप सिंह कैरों का नहीं.

यह भी पढ़ें – सुखदेव ने कसा तंज तो मातृभूमि के लिए मर मिटने को तैयार हो गए भगत सिंह

किंतु यदि उसका खानदान आर्य समाज का सक्रिय कार्यकर्ता न होता तो न उसने ‘भागां वाला’ बनना था, न शहीदे आजम. यदि आर्य समाज आंदोलन से किसान आंदोलन के योद्धा न पैदा होते तो भगत सिंह इंडियन रिपब्लिकन आर्मी का नेता भले ही बन जाता, इंडियन सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी का नेता नहीं बन पाता.

भगत सिंह पंजाब का पहला बुद्धिजीवी था, जिसने समाज की रूपरेखा पर वैज्ञानिक ढंग से विचार किया. वह प्रथम बुद्धिमान था, जिसने दुखों-समस्याओं के अंतिम तल तक गहरी तह में छिपे वर्ग अंतर्विरोधों को देखा. वह पहला देशभक्त था, जिसके मन में सामाजिक सुधार का कोई निश्चित दृष्टिकोण था. वह पहला पंजाबी महापुरुष था, जिसने बुद्धि व भावनाओं के सुमेल के लिए धुंधली मान्यताओं का सहारा नहीं लिया. वह पहला पंजाबी था, जो देशभक्ति के शावनवादी विचारों से मुक्त हो सका. वह पहला पंजाबी था, जिसने गांधीवाद के खोखलेपन व पिलपिले मानववाद, आदर्शवाद को चुनौती दी.

यह भी पढ़ें – पीएम नरेंद्र मोदी और अमिताभ बच्चन ने शहादत दिवस पर दी श्रद्धांजलि

पंजाब के चिंतन प्रवाह को उसकी देन, सांडर्स को मारने, असेंबली में बम फेंकने, फांसी चढ़ने से भी कहीं बड़ी है. भगत सिंह ने पहली बार पंजाब को पशुता, पहलवानी और जहालत से हटाकर बौद्धिकता की ओर मोड़ा. उसने पंजाबियों के लिए बुद्धि विकास के दरवाजे खोल दिए. भगत सिंह के जीवन के सामान्य तथ्यों पर रोशनी डालने, उसके बुतों को हार पहनाने, उसकी मां के खिलाफ कविताएं लिखने (भगत सिंह की मां ने सरकार से सम्मान व गाड़ी ले ली थी) से ज्यादा लाभ नहीं होगा. जरूरत है, उसकी विचारधारा को समझने व आगे बढ़ाने की. जिस दिन वह फांसी पर चढ़ा, उसकी कोठरी से लेनिन की किताब मिली थी, जिसका एक पृष्ठ मोड़ा हुआ था.

शहादत दिवस पर पाश की लिखी कविता ’23 मार्च’

भगत सिंह और पाश

भगत सिंह और अवतार सिंह संधू ‘पाश’.

उसकी शहादत के बाद बाक़ी लोग

किसी दृश्य की तरह बचे

ताज़ा मुंदी पलकें देश में सिमटती जा रही झांकी की

देश सारा बच रहा बाक़ी

उसके चले जाने के बाद

उसकी शहादत के बाद

अपने भीतर खुलती खिडकी में

लोगों की आवाज़ें जम गयीं

उसकी शहादत के बाद

देश की सबसे बड़ी पार्टी के लोगों ने

अपने चेहरे से आंसू नहीं, नाक पोंछी

गला साफ़ कर बोलने की

बोलते ही जाने की मशक की

उससे संबंधित अपनी उस शहादत के बाद

लोगों के घरों में, उनके तकियों में छिपे हुए

कपड़े की महक की तरह बिखर गया

शहीद होने की घड़ी में वह अकेला था ईश्वर की तरह

लेकिन ईश्वर की तरह वह निस्तेज न था

(साभारः चमनलाल द्वारा संपादित पुस्तक ‘वर्तमान के रू-ब-रू पाश)