क्लाउड सीडिंग का चमत्कार! उड़ान के कुछ देर बाद ही दिखने लगे बारिश के संकेत, इन इलाकों में होगी बरसात

Delhi Cloud Seeding Trial: राजधानी दिल्ली में आज IIT Kanpur के नेतृत्व में क्लाउड सीडिंग ट्रायल हुआ है. इस दौरान 8 फ्लेयर छोड़े गए. अगले कुछ घंटे में बारिश की संभावना है, जिससे वायु-प्रदूषण नियंत्रण में आएगा.

Published date india.com Published: October 28, 2025 6:15 PM IST
क्लाउड सीडिंग का चमत्कार! उड़ान के कुछ देर बाद ही दिखने लगे बारिश के संकेत, इन इलाकों में होगी बरसात

देश की राजधानी दिल्ली की हवा को साफ करने और नकली बारिश कराने के लिए आज क्लाउड सीडिंग का ट्रायल किया गया, जो सफल रहा. IIT कानपुर की टीम ने मेरठ से उड़ान भरने वाले Cessna एयरक्राफ्ट की मदद से यह ट्रायल किया, जिसमें खेकरा, बुराड़ी, करोल बाग, मयूर विहार, सड़कपुर और भोजपुर जैसे इलाकों में 8 फ्लेयर्स छोड़े गए. इस प्रक्रिया में कुल लगभग आधा घंटा लगा.

IIT कानपुर के वैज्ञानिकों के अनुसार, अगले कुछ घंटों में दिल्ली में किसी भी समय बारिश हो सकती है. इस प्रयोग का वीडियो भी IIT कानपुर ने जारी किया है, जिसमें बादलों में जलवाष्प को सक्रिय करते हुए फ्लेयर्स को निकलते देखा जा सकता है.

300 पार पहुंच गया था दिल्ली का AQI

दिल्ली सरकार के मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने बताया कि आज क्लाउड सीडिंग के दो ट्रायल सफल रहे और तीसरा ट्रायल भी आज ही किया गया. सिरसा के अनुसार, इसके असर से 15 मिनट से लेकर 4 घंटे के भीतर कहीं भी बारिश शुरू हो सकती है.

यह सब दिल्ली के बढ़ते वायु प्रदूषण को कम करने के लिए किया जा रहा है. बता दें दिवाली के बाद दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 300 के पार पहुंच गया था, जो ‘बेहद खराब’ श्रेणी में आता है. ऐसे में नकली बारिश के जरिए हवा में मौजूद धूल और स्मॉग को नीचे बैठाने की कोशिश की जा रही है.

प्रदूषण से राहत के लिए वैज्ञानिकों की कोशिश

क्लाउड सीडिंग को भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग की मंजूरी के बाद किया गया. यह दिल्ली में कृत्रिम वर्षा का पहला बड़ा प्रयास है. इस साल मई में दिल्ली सरकार ने 3.21 करोड़ रुपये की लागत से पांच ट्रायल की मंजूरी दी थी, लेकिन ये किसी न किसी कारण बार-बार टलता रहा. आज आखिरकार IIT कानपुर की टीम ने इसे सफलतापूर्वक पूरा किया.

क्लाउड सीडिंग क्या होती है?

क्लाउड सीडिंग यानी बादलों से कृत्रिम बारिश कराने की तकनीक है. इसमें वैज्ञानिक ऐसे बादलों की पहचान करते हैं, जिनमें नमी तो होती है लेकिन वे खुद से बरस नहीं पाते. फिर विमान या ड्रोन की मदद से उन बादलों में सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड या पोटैशियम आयोडाइड जैसे रसायन छोड़े जाते हैं. ये रसायन जलवाष्प को आकर्षित कर उसे छोटे-छोटे जलकणों में बदल देते हैं और कुछ देर बाद ये जलकण बारिश के रूप में धरती पर गिरने लगते हैं. आमतौर पर इसका असर 15 मिनट से लेकर 4 घंटे तक दिखाई देता है. हालांकि यह हर बादल पर काम नहीं करता, लेकिन यह तकनीक प्रदूषण और सूखे जैसी समस्याओं से जूझते शहरों के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभर रही है.

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