
Gargi Santosh
मेरा नाम गार्गी संतोष है. मुझे मीडिया क्षेत्र में काम करते हुए चार साल हो चुके हैं. इस समय मैं Zee Media के India.com में सब एडिटर के रूप में ... और पढ़ें
देश की राजधानी दिल्ली की हवा को साफ करने और नकली बारिश कराने के लिए आज क्लाउड सीडिंग का ट्रायल किया गया, जो सफल रहा. IIT कानपुर की टीम ने मेरठ से उड़ान भरने वाले Cessna एयरक्राफ्ट की मदद से यह ट्रायल किया, जिसमें खेकरा, बुराड़ी, करोल बाग, मयूर विहार, सड़कपुर और भोजपुर जैसे इलाकों में 8 फ्लेयर्स छोड़े गए. इस प्रक्रिया में कुल लगभग आधा घंटा लगा.
IIT कानपुर के वैज्ञानिकों के अनुसार, अगले कुछ घंटों में दिल्ली में किसी भी समय बारिश हो सकती है. इस प्रयोग का वीडियो भी IIT कानपुर ने जारी किया है, जिसमें बादलों में जलवाष्प को सक्रिय करते हुए फ्लेयर्स को निकलते देखा जा सकता है.
दिल्ली सरकार के मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने बताया कि आज क्लाउड सीडिंग के दो ट्रायल सफल रहे और तीसरा ट्रायल भी आज ही किया गया. सिरसा के अनुसार, इसके असर से 15 मिनट से लेकर 4 घंटे के भीतर कहीं भी बारिश शुरू हो सकती है.
यह सब दिल्ली के बढ़ते वायु प्रदूषण को कम करने के लिए किया जा रहा है. बता दें दिवाली के बाद दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 300 के पार पहुंच गया था, जो ‘बेहद खराब’ श्रेणी में आता है. ऐसे में नकली बारिश के जरिए हवा में मौजूद धूल और स्मॉग को नीचे बैठाने की कोशिश की जा रही है.
#WATCH | Delhi | “The second trial of cloud seeding was conducted in Delhi by IIT Kanpur through Cessna Aircraft. The aircraft entered Delhi from the direction of Meerut. Khekra, Burari, North Karol Bagh, Mayur Vihar were covered under this. 8 flares were used in cloud seeding.… pic.twitter.com/xMby0wBLJh
— ANI (@ANI) October 28, 2025
क्लाउड सीडिंग को भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग की मंजूरी के बाद किया गया. यह दिल्ली में कृत्रिम वर्षा का पहला बड़ा प्रयास है. इस साल मई में दिल्ली सरकार ने 3.21 करोड़ रुपये की लागत से पांच ट्रायल की मंजूरी दी थी, लेकिन ये किसी न किसी कारण बार-बार टलता रहा. आज आखिरकार IIT कानपुर की टीम ने इसे सफलतापूर्वक पूरा किया.
क्लाउड सीडिंग यानी बादलों से कृत्रिम बारिश कराने की तकनीक है. इसमें वैज्ञानिक ऐसे बादलों की पहचान करते हैं, जिनमें नमी तो होती है लेकिन वे खुद से बरस नहीं पाते. फिर विमान या ड्रोन की मदद से उन बादलों में सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड या पोटैशियम आयोडाइड जैसे रसायन छोड़े जाते हैं. ये रसायन जलवाष्प को आकर्षित कर उसे छोटे-छोटे जलकणों में बदल देते हैं और कुछ देर बाद ये जलकण बारिश के रूप में धरती पर गिरने लगते हैं. आमतौर पर इसका असर 15 मिनट से लेकर 4 घंटे तक दिखाई देता है. हालांकि यह हर बादल पर काम नहीं करता, लेकिन यह तकनीक प्रदूषण और सूखे जैसी समस्याओं से जूझते शहरों के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभर रही है.
ब्रेकिंग न्यूज और लाइव न्यूज अपडेट के लिए हमें फेसबुक पर लाइक करें या ट्विटर पर फॉलो करें. India.Com पर विस्तार से पढ़ें India Hindi की और अन्य ताजा-तरीन खबरें
By clicking “Accept All Cookies”, you agree to the storing of cookies on your device to enhance site navigation, analyze site usage, and assist in our marketing efforts Cookies Policy.