नई दिल्‍ली: एंटीबायोटिक प्रतिरोधी ‘सुपरबग’ हर साल 7 लाख लोगों की जान ले लेते हैं और हर साल ऐसे होने वाली मौतों की संख्‍या बढ़ती जा रही है. अगर यही स्थिति लगातार जारी रही तो 2050 तक यह मौतों का आंकड़ा 10 मिलियन को छू सकता है. यह ‘सुपरबग’ की स्‍थ‍िति इसलिए हो रही है कि रोग पैदा करने वाले सूक्ष्‍म जीवाणु उनकी नियंत्र‍ित करने वाली एंटीबायोटिक्‍स के प्रतिरोधी होते जा रहे हैं और सुपरबग के रूप में बढ़ रहे हैं. इस विषय ‘सुपरबग: एंटीबयोटिक्स का अंत?’पर चल रही प्रदर्शनी इस खतरे के विभिन्‍न पहलुओं पर व्‍यापक प्रकाश डाल रही है.

बता दें कि जब एंटीबायोटिक बेअसर हो जाती हैं लोग उस संक्रमण का शिकार बन जाते हैं, जिसका इलाज नहीं किया जा सकता. अस्पतालों में बैक्टीरिया के प्रसार को नियंत्रित करना कठिन हो जाता है. मरीज का जीवन खतरे में पड़ जाता है. किसान अपने पशुओं के बीमार होने पर उनका इलाज नहीं कर पाते. पर्यावरण अनेक जोखिमों से भर जाता है, जिससे मनुष्यों के साथ पशुओं में भी प्रतिजीवाणुक प्रतिरोध फैल जाता है. इस समस्या से निपटने के लिए डॉक्टरों, रोगियों, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, नर्सों, अभियानकर्ताओं, विशेषज्ञों को किसानों-सबको मिलकर काम करने की जरूरत है.

बीते 6 सितंबर को नई दिल्‍ली में राष्‍ट्रीय विज्ञान में आयोजित एक प्रदर्शनी ‘सुपरबग: एंटीबयोटिक्स का अंत?’ का उद्घाटन केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री डॉ. हर्ष वर्धन और संस्‍कृति राज्‍य मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल ने किया. यह प्रदर्शनी राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद (राविसंप) द्वारा साइन्स म्यूजियम ग्रूप, लंदन और वेलकम, यूके के सहयोग से आयोजित की गई है.

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) द्वारा समर्थित यह प्रदर्शनी 17 नवंबर 2019 तक चलेगी. प्रदर्शनी के तीन प्रमुख खंड माइक्रोस्कापिक, ह्यूमन और ग्लोबल इस विषय, रोगाणुओं, एंटीबायोटिक चुनौतियां, प्रभाव और अनुसंधान के बारे में बताया गया. नई एंटीबायोटिक की खोज करने या इस संकट का सामना करने के लिए वैकल्पिक तरीकों के संबंध में वैश्विक प्रयासों, खोज एवं इस मुद्दे पर जागरूकता के बारे में बताया जा रहा है.