नई दिल्ली: हरियाणा के मिर्चपुर दलित हत्याकांड में 33 लोगों को दोषी करार देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि ‘प्रभावशाली जातियों द्वारा अनुसूचित जातियों पर किया गया अत्याचार इस बात का उदाहरण है कि आजादी के 71 साल बाद भी इसमें कोई कमी नहीं आई है.’ हरियाणा के हिसार जिले के मिर्चपुर गांव में 2010 में दलितों के घरों में आग लगा दी गई थी, जिसमें  एक बुजुर्ग और उनकी बेटी की मौत हो गई थी. Also Read - दिल्ली HC ने दिया आदेश-ऑनलाइन क्लासेज के लिए छात्रों को दें मोबाइल-लैपटॉप, इंटरनेट पैक

दिल्ली हाईकोर्ट ने 2010 के मिर्चपुर दलित हत्याकांड में आज प्रभावशाली जाट समुदाय के 12 लोगों को आजीवन कारावास की सजा देने के साथ ही 21 अन्य को मामले में अलग-अलग अवधि के कारावास की सजा सुनाई. इस मामले में सुनवाई अदालत ने 98 आरोपियों में से सिर्फ 15 को दोषी करार दिया था लेकिन हाईकोर्ट ने 20 लोगों को बरी किए जाने के फैसले को पलट दिया. Also Read -  कोर्ट से नहीं देखी गई 87वर्षीय बुजुर्ग की परेशानी, रक्षा विभाग पर लगाया एक लाख का जुर्माना

निचली कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए दो लोगों की अपील के लंबित रहने के दौरान मौत हो गई. जिन 20 लोगों की रिहाई के फैसले को पलटा गया, उनमें से 5 को हाईकोर्ट द्वारा आजीवन कारावास की सजा दी गई है, जबकि 15 को एक से दो साल की कैद की सजा सुनाई गई. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस बात के पर्याप्त साक्ष्य हैं कि जाटों द्वारा बाल्मिकी समुदाय के खिलाफ बड़े पैमाने पर साजिश रची गई. Also Read - दिल्ली हाईकोर्ट ने 'गुंजन सक्सेना : द कारगिल गर्ल' की स्ट्रीमिंग पर रोक से किया इनकार

निचली कोर्ट ने 31 अक्टू बर, 2011 को आईपीसी की धारा 304 के तहत गैरइरादतन हत्या के अपराध के लिए कुलविंदर, धरमबीर और रामफल को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. हाईकोर्ट ने इन प्रावधानों को संशोधित करते हुए उन्हें आईपीसी की धारा 302 के तहत हत्या के अपराध का दोषी ठहराया. हाईकोर्ट ने जिन 9 और लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है,  उनमें हैं-करमबीर, प्रदीप, राजपाल, प्रदीप, जोगल, सत्यवान, पवन, संजय और धरमबीर हैं. हाईकोर्ट ने 33 दोषियों पर अलग-अलग राशि का जुर्माना भी लगाया और कहा कि हरियाणा सरकार दोषियों से जुर्माने के रूप में मिली धनराशि का इस्तेमाल पीड़ितों को आर्थिक राहत एवं पुनर्वास के प्रावधानों के लिए करे. मिर्चपुर गांव हरियाणा के हिसार और जींद जिले की सीमा पर स्थित है.

बता दें निचली अदालत ने 2011 में जाट समुदाय के कुल 15 लोगों को दोषी ठहराया था, जिनमें दो की मौत अपील लंबित होने के दौरान ही हो गई थी. मामले में कुल 97 आरोपी थे. अदालत ने उन 13 लोगों की सजा को बरकरार रखा, जिन्हें निचली अदालत में दोषी ठहराया गया था. इसके अलावा अदालत ने 20 और आरोपियों को दोषी ठहराया, जिन्हें पहले निचली अदालत ने बरी कर दिया था.

कोर्ट ने इन 20 दोषियों को एक सितंबर, 2018 को या उससे पहले समर्पण करने का निर्देश दिया और ऐसा नहीं करने पर हरियाणा के नारनौंद थाने के प्रभारी से इनको हिरासत में लेने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने को कहा.

70 साल के ताराचंद और उनकी 18 वर्षीय अपंग बेटी सुमन की अप्रैल 2010 में चंडीगढ़ से लगभग 300 किमी दूर मिर्चपुर में उनके घर में आग लगाकर हत्या कर दी गई थी और अन्य दलित घरों को भी आग के हवाले कर दिया गया था. जिन लोगों को दोषी ठहराया गया है, उनमें से चार लोगों कुलविंदर, रामफल, राजेंद्र और पवन को धारा 302 के तहत ताराचंद व सुमन की हत्या का दोषी करार दिया गया है. गांव के जाट और दलित समुदायों के सदस्यों के बीच विवाद के बाद हमले को अंजाम दिया गया था.

जस्टिस मुरलीधर और जस्टिस आई.एस. मेहता की पीठ ने कहा, “मिर्चपुर में 19 से 21 अप्रैल, 2010 के बीच हुई घटनाएं डॉ. बी.आर. आंबेडकर द्वारा 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में संविधान के अंतिम मसौदे को पेश किए जाने के दौरान कही गई उस बात की याद दिलाती हैं,जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘भारतीय समाज में दो चीजें पूरी तरह से अनुपस्थित’ हैं. पहली चीज ‘समानता’ है और दूसरी चीज ‘भाईचारा’ है.”

अदालत ने जाट समुदाय द्वारा वाल्मीकि समुदाय के खिलाफ किए गए ‘सुनियोजित हमले’ के खिलाफ भी कठोर टिप्पणी की. घटना के चलते मिर्चपुर गांव के 254 दलित परिवारों को गांव से पलायन करना पड़ा था. कोर्ट ने कहा, “अनकही बात यह है कि जिन लोगों ने मिर्चपुर गांव में वापस रहने का फैसला किया था, उन लोगों ने वर्तमान आपराधिक मुकदमे में अभियोजन पक्ष का समर्थन नहीं किया, जबकि जिन्होंने वापसी नहीं करने का फैसला किया, उन्होंने ऐसा (अभियोजन पक्षा का साथ देना) किया.”

कोर्ट ने कहा कि यह स्थिति मिर्चपुर गांव में 19, 20 और 21 अप्रैल, 2010 की घटनाओं के परिणामस्वरूप दलितों के भीतर अब भी मौजूद भय की कहानी अपने आप में कह रही है. पीठ ने इस बात का भी उल्लेख किया कि हरियाणा सरकार ने विस्थापित परिवारों का पुनर्वास मिर्चपुर में कराने के बजाय एक अलग इलाके में कराने को कहा है और इसे ‘बुद्धिसम्मत तथ्य’ बताया है.

अदालत ने 209 पेज के आदेश में इस पर सवाल उठाते हुए कहा, “सवाल यह है कि क्या यह समानता, सामाजिक न्याय और भाईचारे के संवैधानिक वादे के साथ समझौता करता है, जो व्यक्ति की गरिमा बनाए रखने के बारे में आश्वस्त करता है.” मामले को सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर हिसार से दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया था.