
Gaurav Barar
गौरव बरार (Gaurav Barar) एक अनुभवी पत्रकार और कंटेंट विशेषज्ञ हैं जिनके पास 10 साल से ज्यादा का अनुभव है. वर्तमान में, इंडिया.कॉम में बतौर चीफ सब एडिटर अपनी सेवाएं ... और पढ़ें
Delhi Riots Case: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 2020 के दिल्ली हिंसा साजिश मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया. शीर्ष अदालत ने मामले के मुख्य आरोपियों में शामिल उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिसे उनके लिए एक बड़े कानूनी झटके के रूप में देखा जा रहा है.
हालांकि, इसी मामले में चार साल से जेल में बंद पांच अन्य आरोपियों को कोर्ट ने जमानत दे दी है, जिससे उन्हें बड़ी राहत मिली है. जस्टिस की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अदालत ने सभी आरोपियों का सामूहिक मूल्यांकन करने के बजाय प्रत्येक मामले की व्यक्तिगत रूप से समीक्षा की है.
कोर्ट ने पाया कि उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका अन्य आरोपियों की तुलना में विशिष्ट और गंभीर है. अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों की समीक्षा के बाद, पीठ ने संतोष व्यक्त किया कि इन दोनों के खिलाफ लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया सही प्रतीत होते हैं.
अदालत ने जिन पांच आरोपियों को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है, उनके नाम हैं- गुलफिशा फातिमा, मेरान हैदर, शफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद. इन आरोपियों के लिए यह फैसला एक बड़ी राहत लेकर आया है, क्योंकि यह मामला पिछले चार वर्षों से राजनीतिक और कानूनी रूप से बेहद संवेदनशील बना हुआ है.
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में जमानत देने के मापदंडों पर विस्तृत चर्चा की. पीठ ने टिप्पणी की, “देश की सुरक्षा से जुड़े अपराधों में, कानून जमानत के लिए एक अलग और कड़ा मानक लागू करता है.” कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धारा 43D(5) के तहत जमानत की शर्तें सख्त हैं.
अदालत ने सीधे तौर पर कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम इस धारा के तहत निर्धारित मानकों को पूरा नहीं करते हैं. कानून के मुताबिक, यदि अभियोजन पक्ष की सामग्री प्रथम दृष्टया विश्वसनीय लगती है, तो हिरासत जारी रहनी चाहिए. इसके विपरीत, यदि साक्ष्यों में दम नहीं है, तभी जमानत पर विचार किया जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में जोर दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में जब आरोप प्रथम दृष्टया सच प्रतीत होते हैं, तो आरोपी को हिरासत में रखना अनिवार्य होता है. खालिद और इमाम के मामले में, पीठ ने पाया कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप गंभीर हैं और इस मोड़ पर उन्हें रिहा करना उचित नहीं होगा.
दिल्ली पुलिस ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत का कड़ा विरोध किया था. पुलिस का तर्क था कि उनके द्वारा किए गए अपराध केवल सहज विरोध प्रदर्शन नहीं थे, बल्कि राज्य को अस्थिर करने का एक जानबूझकर किया गया प्रयास था. पुलिस ने इसे तख्तापलट और आर्थिक नाकेबंदी के उद्देश्य से रची गई एक सुव्यवस्थित साजिश करार दिया.
इससे पहले सितंबर में, उमर खालिद ने दिल्ली की एक अदालत में अपना पक्ष रखते हुए इस FIR को मजाक बताया था. उन्होंने आरोप लगाया था कि उन्हें फंसाने के लिए सबूत गढ़े गए हैं. उनके वकील ने तर्क दिया था कि अभियोजन पक्ष पहले यह तय करता है कि किसे पकड़ना है और फिर उसके खिलाफ फर्जी दस्तावेज और चार्जशीट तैयार करने के लिए रिवर्स इंजीनियरिंग की जाती है. खालिद ने कहा था कि वह इस मामले में पांच साल से बिना किसी ठोस साक्ष्य के जेल में बंद हैं.
24 फरवरी, 2020 को नागरिकता संशोधन अधिनियम और एनआरसी के विरोध प्रदर्शनों के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी थी. कई दिनों तक चले इन दंगों में 50 से अधिक लोगों की जान गई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे.
इस मामले में उमर खालिद, शरजील इमाम और पूर्व आप पार्षद ताहिर हुसैन सहित 20 लोगों पर दंगों को भड़काने की बड़ी साजिश रचने का आरोप लगाया गया था. फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि खालिद और इमाम के खिलाफ आरोप गंभीर हैं और इस स्तर पर उन्हें रिहा करना उचित नहीं होगा.
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