नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने उत्तर पूर्वी दिल्ली में फरवरी में हुए सांप्रदायिक दंगे से जुड़े एक मामले में अवैध गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार की गई जामिया मिल्लिया इस्लामिया की छात्रा गुलफिशा फातिमा की जमानत अर्जी खारिज कर दी है.Also Read - CM योगी ने दी ओवैसी को चेतावनी-'अब्बा जान-चाचा जान' के उपदेशक सुन लें, हम सख्ती से निपटना जानते हैं

फातिमा ने इस मामले में जांच की अवधि बढ़ाने के सत्र अदालत के 29 जून के आदेश को चुनौती दी थी. उसने इस आधार पर वैधानिक जमानत मांगी थी कि कानून के अनुसार 90 दिनों के अंदर आरोपपत्र दायर नहीं किया गया. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत ने इस आधार पर जमानत अर्जी खारिज कर दी कि उसमें दम नहीं है. Also Read - Farm Laws के बाद अब इस कानून को भी निरस्त करने की उठी मांग, जानें क्या चाहता है जमीयत उलेमा-ए-हिंद

अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने कहा, ”जब जांच करने की अवधि 29 अगस्त तक बढ़ायी गयी और आवेदक (फातिमा) को सत्र न्यायाधीश ने यूएपीए के प्रावधानों के तहत न्यायिक हिरासत में भेजा तब आवेदक द्वारा यह कहने का कोई कारण नहीं है कि आरोपपत्र दस अगस्त को दायर नहीं किया गया. आवेदक ने सत्र न्यायाधीश द्वारा 29 अगस्त को जांच की अवधि बढ़ाये को यह कहते हुए चुनौती देने की कोशिश की कि वह ऐसा आदेश जारी करने के लिए सक्षम नहीं हैं. लेकिन ऐसा कथन इस अदालत के समक्ष नहीं कहा जा सकता है.” Also Read - CS Assault Case: दिल्‍ली की कोर्ट ने CM केजरीवाल और सिसोदिया को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने कहा, ” 29 जून को आदेश जारी किया गया था और उस आदेश के मुताबिक जांच की अवधि 29 अगस्त तक बढ़ायी गई (बाद में उसे और बढ़ाया गया.) इसलिए इस आधार पर वैधानिक जमानत के प्रश्न पर विचार का कोई अवसर पैदा ही नहीं होता कि अंतिम रिपोर्ट दस अगस्त को नहीं दाखिल की गयी. वर्तमान आवेदन में कोई दम नहीं है, इसलिए उसे खारिज किया जाता है.”

अदालत ने 29 जून को जांच पूरी करने के लिए पहले 29 अगस्त तक और फिर 13 अगस्त को यह अवधि 17 सितंबर तक के लिए बढ़ा दी थी.

फातिमा की जमानत अर्जी में दावा किया गया है कि सत्र अदालत पुलिस द्वारा यूएपीए की धारा 43डी (2) (बी) के तहत दाखिल आवेदन पर गौर करने और मंजूर करने के लिए सक्षम नहीं है जिसमें जांच पूरी करने के लिए समय बढ़ाने की मांग की गई थी.

नागरिकता संशोधन कानून के समर्थकों और विरोधियों के बीच हिंसा के बाद उत्तरपूर्वी दिल्ली में 24 अगस्त को सांप्रदायिक दंगे भड़क गए थे. इस दंगे में कम से कम 53 लोगों की जान चली गई थी और करीब 200 लोग घायल हो गए थे.