दिल्ली और केंद्र सरकार के बीच अधिकारों को लेकर जारी लड़ाई के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है. हालांकि, इस फैसले में कई ऐसी चीजें हैं जिसको लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है. पहली नजर में ये फैसला केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली की सरकार के लिए झटका लग रहा है, क्योंकि प्रदेश के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सरकार ने जिस सबसे अहम अधिकार की मांग की थी वो उसे नहीं मिला है. जस्टिस एके सीकरी और जस्टिस अशोक भूषण की पीठ हालांकि भ्रष्टाचार निरोधक शाखा, जांच आयोग गठित करने, बिजली बोर्ड पर नियंत्रण, भूमि राजस्व मामलों और लोक अभियोजकों की नियुक्ति संबंधी विवादों पर अपने विचारों पर सहमत रही. शीर्ष अदालत के इस फैसले को आम आदमी पार्टी ने दुर्भाग्यपूर्ण बताया है. पार्टी ने कहा कि इसमें कोई स्पष्टता नहीं है, दिल्ली के लोग परेशान होते रहेंगे. आइए हम 10 प्वाइंट्स में आपको इस फैसले के बारे में बताते हैं….

1. सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ की इस सवाल पर अलग-अलग राय है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सेवाओं पर नियंत्रण किसके पास हो
2. सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी में सेवाओं के नियंत्रण पर अपना खंडित फैसला वृहद पीठ के पास भेज दिया है
3. दो सदस्यीय पीठ भ्रष्टाचार रोधी शाखा, राजस्व, जांच आयोग और लोक अभियोजक की नियुक्ति के मुद्दे पर सहमत हुई.
4. शीर्ष अदालत ने केंद्र की इस अधिसूचना को बरकरार रखा कि दिल्ली सरकार का एसीबी भ्रष्टाचार के मामलों में केंद्र के कर्मचारियों की जांच नहीं कर सकता.
5. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र के पास जांच आयोग नियुक्त करने का अधिकार होगा.
6. बहरहाल, दिल्ली सरकार के पास बिजली आयोग या बोर्ड नियुक्त करने या उससे निपटने का अधिकार मिल गया है.
7. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपराज्यपाल के बजाय दिल्ली सरकार के पास लोक अभियोजकों या कानूनी अधिकारियों को नियुक्त करने का अधिकार होगा.
8. भूमि राजस्व की दरें तय करने समेत भूमि राजस्व के मामलों को लेकर अधिकार दिल्ली सरकार के पास होगा.
9. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपराज्यपाल को अनावश्यक रूप से फाइलों को रोकने की जरुरत नहीं है.
10. राय को लेकर मतभेद होने की स्थिति में फाइलों को राष्ट्रपति के पास भेजा जाना चाहिए.