
Gargi Santosh
गार्गी संतोष, जी मीडिया के India.com में सब-एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. वह हाइपरलोकल, नेशनल और वर्ल्ड सेक्शन की जिम्मेदारी संभाल रही हैं. गार्गी को लाइफस्टाइल, हेल्थ, टेक्नोलॉजी, और ... और पढ़ें
महाराष्ट्र के 19 वर्षीय देवव्रत महेश रेखे ने ऐसा वैदिक चमत्कार कर दिखाया है, जिसे सुनकर हर कोई गर्व महसूस कर रहा है. वाराणसी के वल्लभराम शालिग्राम सांगवेद विद्यालय में उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिन शाखा के 2000 मंत्रों वाले ‘दंडकर्म पारायणम्’ को 50 दिनों में पूरा किया. सबसे खास बात यह है कि काशी की धरती पर यह अनुष्ठान लगभग 200 साल बाद संपन्न हुआ है. इससे पहले ऐसा पारायण महाराष्ट्र के नासिक में वेदमूर्ति नारायण शास्त्री देव ने किया था. लगातार सुबह से शाम तक पूरी शुद्धता के साथ मंत्रों का उच्चारण करना किसी तपस्या से कम नहीं था, और देवव्रत ने यह साधना बड़े अनुशासन और समर्पण के साथ पूरी की.
देवव्रत की इस उपलब्धि ने केवल काशी ही नहीं, पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उनकी प्रशंसा करते हुए लिखा कि 19 वर्षीय देवव्रत ने जो हासिल किया है, वह जानकर मन प्रफुल्लित हो गया है.
19 वर्ष के देवव्रत महेश रेखे जी ने जो उपलब्धि हासिल की है, वो जानकर मन प्रफुल्लित हो गया है। उनकी ये सफलता हमारी आने वाली पीढ़ियों की प्रेरणा बनने वाली है।
भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले हर एक व्यक्ति को ये जानकर अच्छा लगेगा कि श्री देवव्रत ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन… pic.twitter.com/YL9bVwK36o
— Narendra Modi (@narendramodi) December 2, 2025
पीएम मोदी ने कहा कि यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी. उन्होंने यह भी बताया कि इतने महत्वपूर्ण वैदिक मंत्रों का 50 दिनों तक बिना किसी अवरोध के शुद्ध उच्चारण, भारतीय गुरु परंपरा की सर्वोच्च छवि दिखाता है. काशी के सांसद होने के नाते, पीएम मोदी ने विशेष गर्व व्यक्त किया कि यह साधना इसी पवित्र भूमि पर पूर्ण हुई.
देवव्रत ने खुद आईएएनएस को बताया कि उनके लिए पीएम मोदी की प्रशंसा किसी सम्मान से कम नहीं है. उन्होंने कहा कि यह उनकी विद्या और गुरु परंपरा का गौरव है. वे बताते हैं कि वेदों में लोगों की रुचि बढ़ाने के लिए उनका प्रयास जारी रहेगा और वह चाहते हैं कि युवा पीढ़ी भी वेद अध्ययन की ओर आकर्षित हो. देवव्रत के पिता महेश चंद्रकांत रेखे ने बताया कि आमतौर पर शुक्ल यजुर्वेद की यह शिक्षा 12 से 15 साल में पूरी होती है, लेकिन उनके बेटे ने इसे मात्र 8-9 साल में पूरा किया. पिता के अनुसार यह पूरी तरह गुरुजनों के आशीर्वाद और बेटे की कठोर साधना का परिणाम है.
देवव्रत की इस साधना ने काशी में आध्यात्मिक उत्साह पैदा कर दिया. संतों, विद्वानों और वैदिक संस्थानों ने इसे एक ऐतिहासिक घटना बताया. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी उन्हें शुभकामनाएं दीं और सम्मानित करने की बात कही. इतने कठिन अनुष्ठान को एक युवा छात्र द्वारा पूरा किया जाना यह दर्शाता है कि भारत की वैदिक परंपरा आज भी नई पीढ़ी के बीच जीवित है. देवव्रत का संदेश भी यही है – गुरु सेवा, भगवान की भक्ति और वेदों के प्रति निष्ठा रखी जाए तो व्यक्ति असंभव लगने वाले लक्ष्यों को भी हासिल कर सकता है. उनकी यह उपलब्धि भारतीय संस्कृति और काशी की आध्यात्मिक विरासत को एक नया वैश्विक पहचान देती है.
(इनपुट-एजेंसी के साथ)
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