नई दिल्ली. कर्नाटक में आगामी 12 मई को विधानसभा चुनाव होने हैं. 15 मई को तय हो जाएगा कि पांच साल से राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार रहेगी या येद्दीयुरप्पा के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी राज्य की सत्ता पर काबिज होगी. यह महज संयोग है कि राज्य में चुनाव उसी दिन हो रहे हैं, जिसके ठीक पांच साल पहले 2013 में सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. कर्नाटक में हमेशा दिल्ली यानी केंद्र की सियासत के उलट राजनीतिक पार्टी के शासन में आने का इतिहास रहा है. इस बार भाजपा इस परंपरा को तोड़ेगी या राज्य के मतदाता सिद्धारमैया को बहुमत देकर नया ‘करिश्मा’ कर दिखाएंगे, इस पर राजनीतिक विशेषज्ञों की नजरें जमी हुई हैं. Also Read - UP Vidhan Parishad Election: यूपी विधान परिषद की 11 सीटों के लिए हुए चुनाव में 55.47% मतदान

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1972 से इसी ट्रेंड पर होते रहे हैं चुनाव

राजनीतिक विशेषज्ञों की माने तो राज्य में केंद्र की सियासत से अलग, विपक्षी पार्टी की सरकार बनने का ट्रेंड नया नहीं है, बल्कि पिछले करीब चार दशकों से यही देखा जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषक मदन मोहन ने इकोनॉमिक टाइम्स को बताया, ‘कर्नाटक में केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के उलट विपक्षी दल की सरकार बनने का ट्रेंड रहा है. वर्ष 1972 में जब कांग्रेस (आई) पार्टी को पूरे देश के मुकाबले सिर्फ कर्नाटक में ही सत्ता हासिल हो सकी थी. जनता सरकार बनने के समय भी यही परंपरा दिखी, जब दोबारा कांग्रेस पार्टी ने ही यहां सरकार बनाई. यह इस राज्य की राजनीतिक संस्कृति रही है.’ उन्होंने कहा कि राज्य में अगर जनता पार्टी के रामकृष्ण हेगड़े की सरकार थी, तो केंद्र में राजीव गांधी के नेतृत्व में सरकार ने शासन संभाला. वहीं 1999 में एस.एम. कृष्णा की सरकार के समय केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार सत्ता में थी.

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एक साथ चुनाव हों तब भी अलग-अलग रहा है मूड

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज के नरेंद्र पाणि ने कर्नाटक और केंद्र की सत्ता में अलग-अलग पार्टियों की सरकार बनने के संदर्भ में इकोनॉमिक टाइम्स से कहा, ‘यह संयोग ही है कि केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के विरोध में खड़ी पार्टी को ही यहां शासन में आने का मौका मिलता है. लेकिन यह भी हकीकत है कि कर्नाटक की जनता का मूड हमेशा अलग रहा है. वह राज्य और केंद्र में अलग-अलग पार्टियों को सरकार के लिए चुनती रही है. यहां तक कि अगर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हों, तब भी जनता ने केंद्र से उलट विपक्षी पार्टी को ही राज्य की सत्ता सौंपी है.’ उन्होंने कहा कि कर्नाटक की जनता का यह चुनावी मूड कब तक चलेगा, कहना मुश्किल है. क्योंकि 2013 में जब राज्य की जनता ने कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए भारी बहुमत से जीत दिलाई, वहीं इसके एक साल बाद ही लोकसभा चुनाव में राज्य की 28 में से 17 सीटों पर भाजपा के पक्ष में वोट डाले.

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इस बार के चुनाव में ट्रेंड बदलने की उम्मीद

राजनीतिक विश्लेषकों के लिए इस बार का चुनाव भी महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि कर्नाटक में विधानसभा चुनाव के ठीक एक साल बाद 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में विशेषज्ञ भी उलझन में दिख रहे हैं. मदन मोहन कहते हैं, ‘इस बार संभव है कि कर्नाटक में केंद्र और राज्य में अलग-अलग पार्टी के पक्ष में मतदान करने का ट्रेंड बदले. हालांकि सिद्धारमैया का शासन ठीक-ठाक रहा है, लेकिन लिंगायत वोटों के बंटवारे और जनता दल (एस) के नेता पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा के खिलाफ जाना, कांग्रेस को भारी पड़ सकता है.’ वहीं, नरेंद्र पाणि ने इकोनॉमिक टाइम्स से कहा, ‘मेरे विचार से इस बार भी कर्नाटक परंपरागत ट्रेंड के अनुसार ही मतदान करेगा. पिछले पांच वर्षों में सत्तारूढ़ पार्टी का कार्यकाल अच्छा रहा है, जनता चुनाव में इस बात को याद रखेगी.’