नई दिल्ली: जम्मू कश्मीर विधानसभा को भंग करने के राज्यपाल के फैसले के तर्क को लेकर संविधान के जानकारों और विधि विशेषज्ञों में मतभेद हैं. एक पक्ष इसे संविधान सम्मत मानता है तो दूसरा पक्ष इसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना बताता है. Also Read - राहुल ने राज्यपाल से पूछा- कश्मीर आने का निमंत्रण बिना शर्त मंजूर, मैं कब आ सकता हूं

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राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने बुधवार रात विधानसभा भंग करने के कदम के पीछे चार तर्क दिये. इनमें ‘‘बड़े स्तर पर खरीद फरोख्त और धन का संभावित लेनदेन’’ और ‘‘विपरीत राजनीतिक विचारधाराओं’’ वाली राजनीतिक पार्टियों द्वारा स्थिर सरकार के गठन की संभावना नहीं होना शामिल है. Also Read - जम्मू कश्मीर: बुधवार आधी रात से लागू हो जाएगा राष्ट्रपति शासन, केंद्र लेगा नीतिगत फैसले

लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचार्य ने कहा कि ऐसा पहली बार हुआ है कि विधानसभा को भंग करने के लिए राज्यपाल इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ‘‘विपरीत राजनीतिक विचारधारा’’ वाली पार्टियों द्वारा एक स्थिर सरकार बनाना असंभव है. आचार्य ने कहा कि राज्यपाल का यह निष्कर्ष कि विपरीत राजनीतिक विचारधाराएं स्थिर सरकार नहीं दे सकते, विश्वसनीय नहीं है.

वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने आचार्य से सहमति व्यक्त करते हुये कहा कि विपरीत राजनीतिक विचारधाराओं के आधार के चलते विधानसभा भंग करना अनुचित है. जम्मू कश्मीर के संविधान विशेषज्ञों ने भी राज्‍यपाल के फैसले से असहमति जताई. राज्‍य के पूर्व महाधिवक्ता मोहम्मद इशाक कादरी ने कहा, ‘‘सरकार बनाने के दावे को देखते हुये विधानसभा भंग करने में संविधान की भावना और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का अनुपालन नहीं किया गया.’’ उन्होंने कहा कि सरकार बनाने के पत्र में किए दावे के समर्थन में राज्यपाल को और अतिरिक्त दस्तावेज मंगा कर खुद को संतुष्ट करना चाहिेये था. कादरी ने कहा कि बीते पांच महीनों से विधानसभा निलंबित रखी गयी और इसका उद्देश्य राज्य में नयी सरकार के गठन को एक अवसर देना था.

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एक अन्य पूर्व महाधिवक्ता अल्ताफ हुसैन नाइक ने कादरी के विचारों से सहमति व्यक्त करते हुये कहा, ‘‘सामन्य तौर पर, उन्हें उस व्यक्ति को एक अवसर देना चाहिये था जो सदन में बहुमत साबित करके सरकार के गठन का दावा करता हो. संविधान की प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिये था.’’

प्रसिद्ध वकील जाफर शाह ने एक दूसरी राय रखते हुये कहा कि विधानसभा को भंग करने का निर्णय राज्यपाल के संतुष्ट होने पर निर्भर है. इसकी न्यायिक समीक्षा भी हो सकती है. उन्होंने कहा, ‘‘विधानसभा को भंग करने के निर्णय के आधार से संबंधित तथ्यों की समीक्षा के लिए न्यायालय की शरण ली जा सकती है.’’

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वहीं, लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष सी काश्यप आचार्य से सहमत नहीं हैं. उन्होंने कहा कि राज्यपाल का निर्णय बिलकुल भी ‘‘असंवैधानिक’’ नहीं है. वरिष्ठ वकील और संविधान विशेषज्ञ राकेश द्विवेदी ने काश्यप से सहमति व्यक्त करते हुये कहा, ‘‘ कोई भी दल इस स्थिति में नहीं है कि वह सरकार का गठन कर सके अथवा स्थाई सरकार दे सके.’’ वरिष्ठ अधिवक्ता अजित सिन्हा ने कहा कि राज्यपाल को उन आधारों को न्याय संगत ठहराना होगा जिसमें कहा गया है कि विपरीत विचारधाराओं वाले दल सरकार बना नहीं सकते. लेकिन यह वैध संवैधानिक तर्क इसलिए है क्योंकि इसमें संवैधानिक प्रणाली और विधि के शासन के पंगु होने की बात है. उन्होंने कहा, ‘‘राज्यपाल ने अपनी शक्तियों का प्रयोग मर्यादा में किया है.’’

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बता दें कि बुधवार को पीडीपी ने कांग्रेस एवं नेशनल कांफ्रेंस के समर्थन से राज्यपाल के समक्ष सरकार बनाने का दावा पेश किया था. लेकिन इसके चंद घटे बाद ही राज्यपाल ने विधानसभा भंग करने का निर्णय ले लिया.