साल 1937, भारत के सभी स्कूलों में हिंदी भाषा को अनिवार्य तौर पर लाए जाने की तैयारी शुरू हुई. सुधारवादी नेता पेरियार ईवीआर इसके खिलाफ संघर्ष कर रहे थे. करुणानिधि भी इस आंदोलन के खिलाफ मुखर हो गए और नाटक, पर्चे और अखबारों के लिए लिखना शुरू कर दिया. द्रविड़ों के आत्मसम्मान की लड़ाई में मुखर तरीके सामने आए. उनके भाषण कौशल ने लोगों को खूब प्रभावित किया. 14 साल की उम्र से आंदोलनों और संगठनों को मजबूती देने वाले करुणानिधि ने राज्य के साथ ही देश की राजनीति में पार्टी का महत्व स्थापित किया. Also Read - तमिलनाडु: वोटिंग से 2 दिन पहले आयकर विभाग की बड़ी कार्रवाई, डीएमके नेता कनिमोझी के घर छापेमारी

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करुणानिधि ने जस्टिस पार्टी के अलागिरी स्वामी के भाषण से प्रेरित होकर 14 साल की उम्र में राजनीति कदम रखा. स्थानीय युवाओं को आंदोलन से जोड़ते हुए उन्होंने तमिल मनवर मंद्रम नाम का छात्र संगठन शुरू किया जो द्रविड़ियन आंदोलन की पहली छात्र इकाई था. यहां शुरू किए गए अखबार मुरसोली ने बाद में डीएमके के आधिकारिक अखबार की शक्ल ली.

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राजनीति में नामकरण का बहुत महत्व है. हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुगलसराय जंक्शन का नाम बदलकर दीन दयाल उपाध्याय नगर कर दिया गया. ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिलेंगे जब रातनीतिक पार्टियों ने सत्ता में आते ही जगहों, शहरों और नगरों के नाम बदले हों. करुणानिधि के लिए भी राजनीतिक जमीन तैयार करने का मौका तब आया जब औद्योगिक शहर कल्लुकुड़ी का नाम सीमेंट व्यापारी के नाम पर डालमियापुरम किया जा रहा था.

डीएमके ने इस बदलाव के खिलाफ आंदोलन किया और करुणानिधि ने स्टेशन से डालमियापुरम नाम हटाकर ट्रैक पर पत्थर लगा दिए और ट्रेनें रोक दीं. इन प्रदर्शनों में दो लोगों की जान चली गई और करुणानिधि को गिरफ्तार कर लिया गया. यहां से उनकी राजनीति को धार मिली.

काला चश्मा बन गई थी करुणानिधि की पहचान, 46 साल बाद ही इसे बदला

करुणानिधि 33 साल की उम्र में 1957 में उन्होंने पहली बार कुलीथलाई सीट से जीत हासिल कर तमिलनाडु विधानसभा पहुंचे. 12 साल बाद 1969 में अन्नादुराई के निधन के बाद वह पहली बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने. तमिलनाडु के पांच बार मुख्यमंत्री रहे. करुणानिधि का जन्म साल 1924 में तमिलनाडु के नागापट्टिनम जिले के थिरिक्कुवलाई में हुआ. वह जिस परिवार से आते हैं वह पारंपरिक रूप से वाद्ययंत्र ‘नादस्वरम’ बजाने का काम करता है.

करुणानिधि को भी इसी परंपरा के अंतर्गत नादस्वरम सीखने के लिए भेजा गया. लेकिन वहां उन्होंने गुरु के जातिगत भेदभाव को महसूस किया. ये वो दौर था जब राज्य में ई वी रामास्वामी ‘पेरियार’ को सुनने की होड़ मची रहती थी. वह ‘आत्मसम्मान’ के नाम से एक आंदोलन चलाते थे जो कि गैर-ब्राह्मणवादी चीजों से प्रभावित था.