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लखनऊ 15 मई:जीवनभर की कमाई लगाकर ऊंची-ऊंची इमारतों में घरों की बुकिंग कराते समय दावे तो बड़े-बड़े किए गए, लेकिन जब भूकंप के झटके आए तो इमारत के भूकंप-रोधी होनी की हकीकत खुलकर सामने आ गई। हकीकत यह है कि कई जगह लोग अभी भी खंडरनुमा घरों और सरकारी कालोनियों में रहने को मजबूर हैं। रही-सही कसर कमजोर बुनियाद पर अवैध निर्माणों ने पूरी कर दी है। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री के निर्देशों के बावजूद शासन-प्रशासन भूकंप आने की अफवाहों को रोकने में सफल नहीं हो पा रहा है, जिससे लोगों की बेचैनी और बढ़ गई है। भूकंप को आने से रोकना भले ही संभव नहीं है, मगर इससे होने वाली तबाही से बचा जा सकता है। भूकंप-रोधी भवन बनाकर जान-माल की क्षति तो रोकी जा सकती है। Also Read - Earthquake News: मध्यप्रदेश के सिवनी में भूकंप के झटके, 4.3 मापी गई तीव्रता

भूकंप-रोधी भवनों के निर्माण के लिए वर्ष 2001 में ही शासनादेश जारी हो चुका है। तत्कालीन विशेष सचिव संजय भूसरेड्डी की ओर से जारी शासनादेश में नगरीय क्षेत्र के तीन से 12 मीटर तक ऊंचाई के सभी इमारतों को भूकंपरोधी बनाना अनिवार्य किया जा चुका है। भूकंप आदि आपदाओं से निपटने के लिए सरकारी प्रावधानों की कमी नहीं है, मगर उसके क्रियान्वयन में शिथिलता है। जब भी भूकंप, बाढ़ आदि आपदाएं आती हैं तो हम सहम जाते हैं। आपदाओं से ज्यादा सरकारी मशीनरी की खस्ताहाल तैयारियां हमें और डराने लगती हैं। Also Read - Earthquake in Maharashtra: महाराष्ट्र के पालघर में भूकंप के हल्के झटके, 3.4 मापी गई तीव्रता

केंद्र सरकार की ओर से वर्ष 2005 में नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट यानी राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम बनाया गया। मगर इसके प्रावधानों को सूबे के लगभग सभी जिलों में अमलीजामा पहनाने में कोताही बरती गई। लिहाजा, जब तक इंतजाम पूरे नहीं होंगे, हर बार हम आपदा की आशंका मात्र से ही सहम जाते रहेंगे।