नई दिल्ली: एक तरफ केंद्रीय सूचना आयोग ने छह राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को पारदर्शिता कानून के तहत लाने का निर्देश दिया है वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग का कहना है कि राजनीतिक दल आरटीआई कानून के दायरे से बाहर हैं. एक आरटीआई आवेदक की याचिका पर चुनाव आयोग ने यह बयान दिया है जिसने छह राष्ट्रीय दलों द्वारा जुटाए गए चंदे की जानकारी मांगी थी. इन छह दलों को सीआईसी जून 2013 में पारदर्शिता कानून के दायरे में लाया था. Also Read - Bihar Assembly Election 2020: चुनाव आयोग ने किया तय, उम्मीदवार इतना ही खर्च करेंगे, जानिए..

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केंद्रीय जनसूचना अधिकारी के बयान का जिक्र करते हुए अपीली आदेश में कहा गया है , ‘ आवश्यक सूचना आयोग के पास मौजूद नहीं है. यह राजनीतिक दलों से जुड़ा हुआ है और वे आरटीआई के दायरे से बाहर हैं. वे इलेक्टोरल बांड के माध्यम से जुटाए गए चंदे या धन की सूचना वित्त वर्ष 2017-18 के कंट्रीब्यूशन रिपोर्ट में ईसीआई को सौंप सकते हैं जिसके लिए निर्धारित तारीख 30 सितम्बर 2018 है.

पुणे के विहार ध्रुव ने आरटीआई के माध्यम से छह राष्ट्रीय दलों बीजेपी, कांग्रेस, बीएसपी, राकांपा, भाकपा और माकपा के अलावा समाजवादी पार्टी द्वारा इलेक्टोरल बांड्स के माध्यम से जुटाए गए चंदे की जानकारी मांगी थी.

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चुनाव आयोग में प्रथम अपीलीय अधिकारी के.एफ. विलफ्रेड ने आदेश में लिखा कि वह सीपीआईओ के विचारों से सहमत हैं. जिन सात राजनीतिक दलों के बारे में सूचना मांगी गई है उनमें से छह भाजपा, कांग्रेस, बसपा, राकांपा, भाकपा और माकपा को आयोग की पूर्ण पीठ ने तीन जून 2013 को अरटीआई कानून के दायरे में लाया था.

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आदेश को ऊपरी अदालतों में चुनौती नहीं दी गई लेकिन राजनीतिक दलों ने आरटीआई आवेदनों को मानने से इंकार कर दिया है. कई कार्यकर्ताओं ने सीआईसी के आदेश का पालन नहीं करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है जहां मामला लंबित है.