नई दिल्ली: अगले महीने रिटायर हो रहे सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा का कहना है कि कानूनी तौर पर कोई भी व्यक्ति आत्महत्या नहीं कर सकता, लेकिन किसी को भी सम्मान के साथ मरने का अधिकार है. पुणे में बैलैंसिंग ऑफ कॉन्स्टिट्यूशनल राइट्स के विषय पर आयोजित एक व्याख्यान को संबोधित करते हुए चीफ जस्टिस ने यह बात कही. उन्होंने कहा कि अगर कोई इंसान कभी न ठीक होने वाली बीमारी से पीड़ित है और वह इच्छामृत्यु चाहता है तो वह इसके लिए अपनी ‘लिविंग विल’ बना सकता है. उन्होंने कहाकि हर व्यक्ति का अपना अधिकार है कि वह अंतिम सांस कब ले और इसके लिए उस पर किसी भी प्रकार का दबाव नहीं होना चाहिए.

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गौरतलब है कि मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने शर्तों के साथ इच्छामृत्यु की मांग पर मुहर लगाई थी. कोर्ट ने कहा था कि देश में हर किसी को सम्मान के साथ मरने का अधिकार है. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा सहित 5 जजों की संवैधानिक पीठ ने ये ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि जीने के अधिकार में मरने का अधिकार भी शामिल है. देश के संविधान हर किसी को ये अधिकार प्राप्त है. सुप्रीम कोर्ट ने मरणासन्न व्यक्ति द्वारा इच्छामृत्यु के लिए लिखी गई वसीयत (लिविंग विल) को मान्यता देने की मांग वाली याचिका पर फैसला सुनाया था.

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असाध्य रोग से ग्रस्त व्यक्ति ने उपकरणों के सहारे उसे जीवित नहीं रखने के संबंध में यदि लिखित वसीयत दिया है, तो यह वैध होगा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वसीयत का पालन कौन करेगा और इस प्रकार की इच्छा मृत्यु के लिए मेडिकल बोर्ड किस प्रकार हामी भरेगा, इस संबंध में वह पहले ही दिशा-निर्देश जारी कर चुका है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस संबंध में कानून बनने तक उसकी ओर से जारी दिशा-निर्देश और हिदायत प्रभावी रहेंगे.

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सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि कुछ दिशा-निर्देशों के साथ इसकी इजाजत दी जा सकती है. ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (इच्छामृत्यु) वह स्थिति है जब किसी मरणासन्न मरीज की मौत की तरफ बढ़ाने की मंशा से उसे इलाज देना बंद कर दिया जाता है. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ ने पिछले साल 11 अक्तूबर को इस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था.