नई दिल्ली. हालिया कर्नाटक विधानसभा चुनाव की तिथियों की घोषणा चुनाव आयोग से पहले सोशल मीडिया पर जारी होने का मामला हो या गुजरात और हिमाचल के चुनाव लंबे अंतराल पर कराने का निर्णय. या फिर दिल्ली में आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों की सदस्यता रद्द करने और बाद में हाईकोर्ट से उनकी सदस्यता बहाल होने का मसला हो, भारत निर्वाचन आयोग के फैसलों पर सवाल उठे हैं. विपक्षी पार्टियों ने आयोग को कठघरे में खड़ा किया है. इन घटनाओं ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने वाली इस संवैधानिक संस्था के दामन पर ‘दाग’ लगाए हैं. साथ ही इस संस्था से पूर्व में जुड़े रहे अधिकारियों का ध्यान भी खींचा है. सोमवार को देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों की राउंड-टेबल बैठक हुई, जिसमें हाल के दिनों में निर्वाचन आयोग की छवि को लेकर हुए विवादों पर चर्चा की गई. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने आयोग को सलाह दी कि वह अपनी छवि से जुड़े इन सवालों की गहराई में जाए और तत्काल इसका समाधान करे. Also Read - दिल्ली चुनाव में नफरत भरे भाषणों पर सजा नहीं देने के पूर्व CEC के आरोपों का आयोग ने दिया जवाब

दर्जनभर से ज्यादा पूर्व अधिकारियों ने जताई चिंता
निर्वाचन आयोग की छवि को लेकर जिस बैठक में चिंता जताई गई, उसमें पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों के साथ-साथ मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत, चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा और अशोक लवासा भी मौजूद थे. पूर्व चुनाव आयुक्तों में एम.एस. गिल, जे.एम. लिंगदोह, टी.एस. कृष्णमूर्ति, बी.बी. टंडन, डॉ. एस.वाई. कुरैशी, वी.एस. संपत, एच.आर. ब्रह्मा, डॉ. नसीम जैदी और जी.वी.जी. कृष्णमूर्ति इस बैठक में शामिल थे. बैठक में जिन मुद्दों पर बात हुई उसके बारे में इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने कहा, ‘बैठक में चुनाव आयोग की हाल के दिनों में बनी छवि पर चर्चा हुई. उन वैध या अवैध सवालों पर भी पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने बात की, जो हाल के दिनों में आयोग को लेकर उठाए गए थे. सभी इस बात पर एकमत थे कि आयोग को इन सवालों की गहराई में जाना होगा. इसकी पड़ताल करनी होगी कि आखिर क्यों ऐसी स्थितियां बनीं.’ Also Read - अरविंद केजरीवाल का चुनाव आयोग से सवाल- वोटिंग के 24 घंटे बाद भी आंकड़े क्यों नहीं किए जारी?

हिमाचल-गुजरात चुनाव और ‘आप’ विधायकों का मामला रहा चर्चा में
निर्वाचन आयोग के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ए.के. जोति के कार्यकाल के दौरान हिमाचल प्रदेश और गुजरात चुनाव के तिथियों के बीच लंबे अंतराल को लेकर काफी विवाद हुआ था. दरअसल, दोनों प्रदेशों में चुनाव के बाद मतगणना की तारीखें तो एक ही दिन रखी गई थीं, लेकिन चुनाव कराने की घोषणा अलग-अलग दिनों में की गई. इसको लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठे थे कि उसने जान-बूझकर दोनों प्रदेशों में चुनाव कराने की घोषणा अलग-अलग दिनों में की. इसके बाद दिल्ली में आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों के लाभ का पद पर रहने के मामले में विधायकों का पक्ष सुने बिना निर्णय देने को लेकर भी आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाया गया था. दिल्ली हाईकोर्ट ने विधायकों की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था कि निर्वाचन आयोग ने ‘प्राकृतिक न्याय’ के सिद्धांतों का पालन करने में नाकाम रहा है. हाईकोर्ट ने विधायकों का पक्ष नहीं सुने जाने को आधार मानते हुए उन्हें ‘अयोग्य’ माने जाने से इनकार कर दिया था. Also Read - Delhi Election 2020: चुनाव से जनता को जोड़ने में आयोग के प्रयास सराहनीय, लेकिन नेताओं ने किया दुखी: केवल कृष्ण

कर्नाटक चुनाव को लेकर भी घेरे में आया था आयोग
चुनाव आयोग की कार्यशैली को लेकर सिर्फ गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनावों के समय ही सवाल नहीं उठे थे, बल्कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव की घोषणा के वक्त भी आयोग विपक्षी दलों के निशाने पर आया था. दरअसल, कर्नाटक विधानसभा चुनाव की तिथियों को लेकर निर्वाचन आयोग द्वारा आधिकारिक घोषणा से पहले ही सोशल मीडिया साइट टि्वटर पर भाजपा और कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा चुनाव की तिथियों से संबंधित ट्वीट कर दिए गए थे. मामले पर जब विवाद हुआ तो आयोग ने इसकी जांच कराई. जांच के बाद आयोग के आधिकारिक बयान में कहा गया कि सोशल मीडिया पर चुनाव की तिथियों की घोषणा महज अटकलों पर आधारित थी. कर्नाटक के एक टीवी चैनल में प्रसारित खबर के आधार पर दोनों दलों के नेताओं ने इन तिथियों के बारे में ट्वीट किया था.