Farmers protest: विवादों में घिरे तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग को लेकर कांग्रेस और कई अन्य विपक्षी पार्टियों के सदस्यों के हंगामे के कारण मंगलवार को लोकसभा में प्रश्नकाल नहीं चल सका और एक बार के स्थगन के बाद सदन की बैठक शाम 7 बजे तक स्थगित कर दी. सदन में हंगामे के बीच कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि सरकार किसानों से जुड़े मुद्दों पर संसद के अंदर और बाहर चर्चा करने को तैयार है. Also Read - राहुल गांधी ने अनुराग कश्‍यप और तापसी पन्‍नू पर IT Raid को लेकर सरकार पर कसा तंज

संसद के बजट सत्र के तीसरे दिन लोकसभा की कार्यवाही अपराह्न 4 बजे आरंभ होने के साथ ही कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक के सदस्य अध्यक्ष के आसन के निकट आकर नारेबाजी करने लगे. वे तीनों विवादास्पद कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे थे. विपक्षी सदस्य ‘कानून वापस लो’ के नारे लगा रहे थे. कई सदस्यों के हाथों में तख्तियां भी थीं जिन पर कृषि कानूनों को वापस लेने की मांगें लिखी थीं. Also Read - Kisan Andolan: किसान आंदोलन से NHAI के सामने बड़ी चुनौतियां, कई प्रोजेक्ट के काम लटके

जिसके बाद कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने मंगलवार को कहा कि सरकार ने पिछले कई वर्षों से कृषि सुधारों के संबंध में सभी पक्षकारों के साथ वार्ता की है तथा नये कृषि कानूनों से जुड़े मुद्दे के समाधान के लिये सरकार एवं आंदोलनकारी किसान संगठनों के बीच 11 दौर की वार्ता में कानूनों में संशोधन को लेकर सरकार ने एक के बाद एक कई प्रस्ताव रखे हैं. कृषि मंत्री ने यह भी दोहराया कि नये कृषि कानूनों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ेगा. Also Read - Kisan Andolan: आंदोलन तेज करेंगे किसान- SKM का ऐलान, चुनावी राज्यों में BJP का करेंगे विरोध और 12 मार्च को...

लोकसभा में ए राजा, असदुद्दीन ओवैसी, के सुरेश, नुसरत जहां रूही, बदरूद्दीन अजमल, उत्तम कुमार रेड्डी, कनिमोई करूणानिधि और माला राय सहित कई सदस्यों के प्रश्नों के लिखित उत्तर में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने यह जवाब दिया.

कृषि मंत्री से पूछा गया था कि ‘‘क्या सरकार संसद द्वारा तीन विवादास्पद कृषि विधेयकों को पारित करने और कानून बनने से पहले किसानों और अन्य हितधारकों के साथ परामर्श करने में असफल रही .’’ उनसे यह भी पूछा गया था कि ‘‘क्या सरकार को नये कृषि कानूनों के विरोध में हजारों किसानों के पिछले दो महीने से प्रदर्शन करने की जानकारी है और उनके साथ वार्ता के बाद सरकार क्या उनकी जायज मांगों पर विचार करने के बारे में सोच रही है.’’ तोमर ने कहा, ‘‘मुद्दे के समाधान के लिये सरकार एवं आंदोलनकारी किसान संगठनों के बीच 11 दौर की वार्ता हुई है और सरकार ने कृषि कानूनों में संशोधन के बारे में एक के बाद एक कई प्रस्ताव रखे हैं .

उन्होंने यह भी कहा कि उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में कृषि सुधार कानूनों के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी है. एक अन्य प्रश्न के उत्तर में कृषि मंत्री ने कहा, ‘‘पिछले कई वर्षों से कृषि सुधारों के संबंध में सभी पक्षकारों के साथ वार्ता की गई.’’

उन्होंने कहा कि भारत सरकार कृषि विपणन क्षेत्र में सुधारों के लिये लगभग 2 दशकों से राज्यों के साथ सक्रिय रूप से गहनता से कार्य कर रही है . इसका उद्देश्य किसी भी समय और किसी भी जगह बेहतर मूल्य पर अपनी उपज की बिक्री करने के लिये पहुंच वाली मंडियों एवं बाधा मुक्त व्यापार की सुविधा प्रदान करना है.

तोमर ने स्पष्ट किया कि कृषि (सशक्तीकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार अधिनियम 2020 किसानों एवं प्रायोजकों के बीच किसानों की उपज के कृषि समझौते के लिये है, न कि किसानों की भूमि की संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) के बारे में. उन्होंने कहा कि इस अधिनियम के अध्याय 3 के खंड 15 में यह बताया गया है कि किसानों की कृषि भूमि के विरूद्ध किसी भी राशि की वसूली के लिये कोई भी कार्रवाई नहीं की जायेगी.

बातचीत के लिए किसानों ने रखी शर्त

किसानों के आंदोलन को लेकर पुलिस की ओर बरती जा रही सख्ती के बीच संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने भी अपना रुख कड़ा कर लिया है. मोर्चा ने कहा है कि पुलिस एवं प्रशासन द्वारा ‘उत्पीड़न’ बंद होने और हिरासत में लिए गए किसानों की रिहाई तक सरकार के साथ किसी तरह की ‘औपचारिक’ बातचीत नहीं होगी.

कई किसान संगठनों के इस समूह ने एक बयान जारी कर यह आरोप भी लगाया कि सड़कों पर कीलें ठोकने, कंटीले तार लगाने, आंतरिक सड़क मार्गों को बंद करने समेत अवरोधक बढ़ाया जाना, इंटरनेट सेवाओं को बंद करना और ‘भाजपा एवं आरएसएस के कार्यकर्ताओं के माध्यम से प्रदर्शन करवाना’ सरकार, पुलिस एवं प्रशासन की ओर से नियोजित ‘हमलों’ का हिस्सा हैं.

उसने दावा किया कि किसानों के प्रदर्शन स्थलों पर ‘बार-बार इंटरनेट सेवाएं बंद करना’ और किसान आंदोलन से जुड़े कई ट्विटर अकाउंट को ब्लॉक करना ‘लोकतंत्र पर सीधा हमला’ है. सूत्रों का कहना था कि ट्विटर ने सोमवार को अपने सोशल मीडिया मंच पर करीब 250 ऐसे एकाउंट पर रोक लगा दी जिनके जरिए किसान आंदोलन से संबंधित ‘फर्जी और भड़काउ’ पोस्ट किए गए थे.

(इनपुट भाषा)