सुप्रीम कोर्ट ने दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं के खतना (Female Genital Mutilation) प्रथा को लेकर चिंता जताई है. अदालत ने कहा कि अगर कोई धार्मिक प्रथा महिलाओं या बच्चियों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती है, तो उसे संविधान के तहत चुनौती दी जा सकती है. कोर्ट ने साफ कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद-25 में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है, लेकिन यह अधिकार पूरी तरह असीमित नहीं है. अगर कोई प्रथा सार्वजनिक स्वास्थ्य, नैतिकता या कानून-व्यवस्था के खिलाफ जाती है, तो उस पर रोक लगाई जा सकती है.
यह टिप्पणी चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ ने की. पीठ महिलाओं के खतना प्रथा को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने अदालत को बताया कि दुनिया के करीब 59 देशों में इस प्रथा पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है. उन्होंने कहा कि मिस्र और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की अदालतों ने भी इस मामले में हस्तक्षेप किया है. हालांकि भारत में इस प्रथा को लेकर कोई विशेष कानून या प्रतिबंध नहीं है.
लूथरा ने अदालत को बताया कि यह प्रक्रिया अक्सर 7 साल तक की छोटी बच्चियों पर की जाती है. इतनी कम उम्र में बच्चियां यह समझने की स्थिति में नहीं होतीं कि उनके साथ क्या हो रहा है, इसलिए उनकी सहमति को सही मायने में मान्य नहीं माना जा सकता. उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया से बच्चियों के शरीर में स्थायी बदलाव हो सकते हैं और इससे उनके यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है.
वकील ने यह भी कहा कि कई परिवार इस प्रथा का पालन इसलिए करते हैं, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो समाज या समुदाय में उनका बहिष्कार हो सकता है. उन्होंने अदालत से कहा कि किसी भी धार्मिक प्रथा को ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ तभी माना जा सकता है जब वह धर्म का अनिवार्य हिस्सा हो. उनके अनुसार महिलाओं के खतना की प्रथा को ऐसा नहीं माना जा सकता.
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि इस मामले में ‘स्वास्थ्य’ और ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य’ जैसे मुद्दे बेहद महत्वपूर्ण हैं. उन्होंने कहा कि अगर कोई प्रथा किसी व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक अखंडता को प्रभावित करती है, तो अदालत को उसकी गहराई से जांच करनी चाहिए. न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने भी कहा कि यह मामला ‘नैतिकता’ के दायरे में भी आता है.
कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि क्या इस प्रथा का उद्देश्य महिलाओं की कामुकता को नियंत्रित करना है? इस पर याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि यह प्रथा महिलाओं की शारीरिक स्वतंत्रता और उनके अधिकारों का उल्लंघन करती है. वहीं, समुदाय की ओर से पेश वकील निजाम पाशा ने इस दलील का विरोध किया. उन्होंने कहा कि इस प्रथा का पालन न करने पर किसी तरह की सजा या बहिष्कार नहीं होता. उन्होंने यह भी कहा कि इसे पुरुषों के खतना की तरह ही देखा जाना चाहिए.
हालांकि न्यायमूर्ति अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति बागची ने पुरुषों और महिलाओं के खतना की तुलना पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि दोनों प्रक्रियाएं अलग हैं और महिलाओं के खतना का स्वास्थ्य पर गंभीर असर हो सकता है. सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी माना कि अगर कोई धार्मिक प्रथा किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों, खासकर बच्चों और महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन करती है, तो अदालत उसमें हस्तक्षेप कर सकती है. सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले में आगे भी विस्तृत सुनवाई करेगा. मामले की अगली सुनवाई 12 मई को तय की गई है.
(इनपुट: PTI)
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