नई दिल्ली. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को लोग सिर्फ एक राजनीतिज्ञ के तौर पर याद नहीं करते, बल्कि उन्हें चिंतक, कवि के रूप में भी जानते हैं. इस देश में उनकी पहचान एक कुशल राजनीतिज्ञ, प्रशासक, भाषाविद, कवि, पत्रकार व लेखक के रूप में रही है. अपनी कविताओं और कवित्व के प्रति वाजपेयी का लगाव कैसा था, इसके बारे में हम उन्हीं की कही बातों को पढ़कर समझ सकते हैं. कविताओं को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा था, ‘मेरी कविता जंग का एलान है, पराजय की प्रस्तावना नहीं. वह हारे हुए सिपाही का नैराश्य-निनाद नहीं, जूझते योद्धा का संकल्प है. वह निराशा का स्वर नहीं, आत्मविश्वास का जयघोष है.’ वाजपेयी की कविताओं का संकलन ‘मेरी इक्यावन कविताएं’ खूब चर्चित रहा, जिसमें…, ‘हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा…’ खास चर्चा में रही. आप भी पढ़िए विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों पर लिखी गई उनकी कुछ कविताएं. Also Read - अटल बिहारी वाजपेयी के अस्थि विसर्जन में हुए खर्च का भुगतान करेगी योगी सरकार, विवाद बढ़ा तो उठाया कदम

1.
क्षमा करो बापू! तुम हमको,
बचन भंग के हम अपराधी,
राजघाट को किया अपावन,
मंज़िल भूले, यात्रा आधी. Also Read - शर्मनाकः पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के अस्थि विसर्जन में खर्च पर विवाद, LDA ने सरकार से मांगा पैसा

जयप्रकाश जी! रखो भरोसा,
टूटे सपनों को जोड़ेंगे.
चिताभस्म की चिंगारी से,
अंधकार के गढ़ तोड़ेंगे. Also Read - स्मृति शेष: जब मुर्शरफ ने वाजपेयी से कहा, आप प्रधानमंत्री होते तो नजारा कुछ और होता

अटल बिहारी वाजपेयी एक कवि के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहते थे. लेकिन, उनकी शुरुआत पत्रकारिता से हुई. बाद में यही पत्रकारिता उनके राजनैतिक जीवन की आधारशिला बनी.

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2.
गीत नया गाता हूं
टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर,
पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर,
झरे सब पीले पात,
कोयल की कूक रात,
प्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूं.
गीत नया गाता हूं.
टूटे हुए सपनों की सुने कौन सिसकी?
अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी.
हार नहीं मानूंगा,
रार नहीं ठानूंगा,
काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं.
गीत नया गाता हूं.

हिन्दी भाषा के प्रति उनके प्रेम का ही प्रतीक था कि संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिन्दी में संबोधन देने वाले वह भारत के पहले राजनीतिज्ञ थे.

3.
यह हार एक विराम है
जीवन महासंग्राम है
तिल तिल मिटूंगा पर दया की
भीख में लूंगा नहीं
वरदान मांगूंगा नहीं.

स्मृति सुखद प्रहरों के लिए
अपने खंडहरों के लिए
यह जान लो मैं विश्व की
सम्पत्ति चाहूंगा नहीं
वरदान मांगूंगा नहीं.

क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संघर्ष पथ पर जो मिले
यह भी सही वह भी सही
वरदान मांगूंगा नहीं.

लघुता न अब मेरी छुओ
तुम हो महान बने रहो
अपने ह्रदय की वेदना
मैं व्यर्थ त्यागूंगा नहीं
वरदान मांगूंगा नहीं.

चाहे ह्रदय को ताप दो
चाहे मुझे अभिशाप दो
कुछ भी करो कर्तव्य-पथ से
किन्तु भागूंगा नहीं.

मूलतः उत्तर प्रदेश के आगरा के बटेश्वर के निवासी अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म मध्यप्रदेश के ग्वालियर में 25 दिसंबर 1924 को हुआ था. उनके पिता कृष्णबिहारी वाजपेयी शिक्षक थे.

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4.
कौरव कौन
कौन पांडव,
टेढ़ा सवाल है.
दोनों ओर शकुनि
का फैला
कूटजाल है.
धर्मराज ने छोड़ी नहीं
जुए की लत है.
हर पंचायत में
पांचाली
अपमानित है.
बिना कृष्ण के
आज
महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है.

अटल बिहारी वाजपेयी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्य के अलावा वीर अर्जुन, राष्ट्रधर्म और स्वदेश जैसे अखबारों के संपादक पद का दायित्व भी संभाला.

5.
आओ फिर से दिया जलाएं
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएं.

आओ फिर से दिया जलाएं.

हम पड़ाव को समझे मंजिल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वर्तमान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएं.
आओ फिर से दिया जलाएं.

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएं.
आओ फिर से दिया जलाएं.