नई दिल्ली:  केंद्र सरकार ने देश की प्रमुख 10 एजेंसियों को किसी भी व्यक्ति या संस्थान के कंप्यूटर का डाटा खंगालने का अधिकार दे दिया है. 20 दिसंबर 2018 को गृह मंत्रालय की ओर से जारी आदेश के अनुसार प्रमुख जांच एजेंसियों को यह अधिकार देने की बात कही गई है. इन एजेंसियों को ये अधिकार होगा कि वे इंटरसेप्शन, मॉनिटरिंग और डिक्रिप्शन के मकसद से किसी भी कंप्यूटर का डाटा खंगाल सकें. इस मामले में विपक्ष के हंगामे के बाद  वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राज्यसभा में सफाई दी है. वित्त मंत्री ने कहा कि इससे आम लोगों के जिंदगी पर कोई असर नहीं पड़ेगा. जेटली ने कहा कि कंप्यूटर इंस्ट्रूमेंट्स आने शुरू हुए तो 18 वर्ष पहले इन्फर्मेशन टेक्नॉलजी ऐक्ट आया. इसके सेक्शन 69 के तहत यह कहा गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और एकता को लेकर किसी चिंताजनक स्थिति में सक्षम एजेंसियां यह जांच कर सकती हैं.

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जेटली ने कहा कि जब आनंद शर्मा मंत्री थे तो 2009 में यूपीए सरकार ने कानून बनाए थे कि कौन सी एजेंसियां होंगी, जिनको ऑथराइज किया जाए. समय-समय पर वही एजेंसियां नोटिफाइ होती रहती हैं. जेटली ने कहा कि कोई व्यक्ति निगरानी नहीं कर सकता. किसी भी फोन या फिर कंप्यूटर की निगरानी नहीं हो सकती. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा, पब्लिक ऑर्डर, देश की अखंडता से खिलवाड़ या खतरे आदि से जुड़े मुद्दों पर एजेंसियां जांच कर सकती हैं. 20 दिसंबर को वही आदेश रिपीट हुआ है जो 2009 में यूपीए की सरकार से चलता आ रहा है. अरुण जेटली ने कहा कि आईटी ऐक्ट के सेक्शन 69 के तहत इस आदेश को जारी किया गया है, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा का जिक्र है. ऐसे में इसके तहत आम आदमी के अधिकारों और उनकी प्राइवेसी में दखल का कोई सवाल ही नहीं उठता है.

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गौरतलब है कि गृह सचिव राजीव गौबा की ओर से जारी आदेश के अनुसार, सूचना प्रौद्योगिकी (सूचना के इंटरसेप्शन, निगरानी और डिक्रिप्टेशन के लिए प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय) नियम, 2009 के नियम 4 के साथ पठित सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 की धारा 69 की उपधारा (1) की शक्तियों का प्रयोग करते हुए उक्त अधिनियम के अंतर्गत संबंधित विभाग, सुरक्षा व खुफिया एजेंसियों को किसी भी कंप्यूटर में आदान-प्रदान किए गए, प्राप्त किए गए या संग्रहित सूचनाओं को इंटरसेप्ट, निगरानी और डिक्रिप्ट करने के लिए प्राधिकृत करता है.

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यह 10 एजेंसियां खुफिया ब्यूरो, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड, राजस्व खुफिया निदेशालय, कैबिनेट सचिव (रॉ), डायरेक्टरेट ऑफ सिग्नल इंटिलिजेंस (केवल जम्मू एवं कश्मीर, पूर्वोत्तर और असम के सेवा क्षेत्रों के लिए) और दिल्ली पुलिस आयुक्त हैं. अधिसूचना में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि किसी भी कंप्यूटर संसाधन के प्रभारी सेवा प्रदाता या सब्सक्राइबर इन एजेंसियों को सभी सुविधाएं और तकनीकी सहायता प्रदान करने के लिए बाध्य होंगे.

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इस संबंध में कोई भी व्यक्ति या संस्थान ऐसा करने से मना करता है तो ‘उसे सात वर्ष की सजा भुगतनी पड़ेगी. सरकार की ओर से इस आदेश को जारी करने के बाद कांग्रस और अन्य पार्टियों ने कड़ा एतराज जताया. कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने ट्वीट कर कहा, इस बार, निजता पर हमला. सुरजेवाला ने ट्वीट कर कहा, मोदी सरकार खुले आम निजता के अधिकार का हनन कर रही है और मजाक उड़ा रही है. चुनाव में हारने के बाद, अब सरकार कंप्यूटरों की ताका-झाकी करना चाहती है? एनडीए के डीएनए में बिग ब्रदर का सिंड्रोम सच में समाहित है.

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कांग्रेस के अन्य नेता अहमद पटेल ने ट्वीट कर कहा, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी को सीधे मंजूरी देना नागरिकों के अधिकारों और निजी स्वतंत्रता पर सीधा हमला है. एआईएमआईएम के अध्यक्ष और लोकसभा सांसद असदुद्दीन औवैसी ने कहा, मोदी ने हमारे संचार पर केंद्रीय एजेंसियों द्वारा निगरानी रखने के लिए एक साधारण सरकारी आदेश का प्रयोग किया है. कौन जानता था कि जब वे ‘घर घर मोदी’ कहते थे तो इसका यह मतलब था.