दुबई में प्रसिद्ध अभिनेत्री श्रीदेवी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद देश के अपराधशास्त्री और न्यायालिक विज्ञानी मामले की गुत्थी समझने में लगे हैं. पोस्टमार्टम के बहुत देर बाद तक भी श्रीदेवी के पति बोनी कपूर को शव नहीं सौंपा गया. शव पब्लिक प्रोसीक्यूशन डिपार्टमेंट की सुपुर्दगी में है. और यहां अपने देश में उनके परिवार और फैंस को इंतजार है कि श्रीदेवी के अंतिम दर्शन करें और विधि पूर्वक अंतिम संस्कार करें. खैर ये दुबई के अपने कानून का मामला है वे उसी तरह से काम निपटाएंगे. लेकिन एक संशय तो पैदा हो ही गया है कि आखिर ऐसा क्या मामला है कि श्रीदेवी की मृत्यु के कारणों को बारीकी से देखने की जरूरत पड़ी. जिन्हें पता है कि मेरी अकादमिक पृष्ठभूमि क्रिमिनोलॉजी और फॉरेंसिक साइंस की है, उन्होंने इस प्रकरण पर मुझसे जानना चाहा. कुछ टीवी चैनलों ने फोन पर बात करनी चाही. चूंकि फिलहाल मामला पोस्टमार्टम और आगे के रासायनिक परीक्षणों के स्तर पर है. तथ्य सामने नहीं है सो कोई टिप्पणी करना ठीक नहीं था. लेकिन ऐसे मामलों के अन्वेषण लिए एक प्रकिया जरूर पहले से तय है. फिलहाल बस अनुभव के आधार पर इसी प्रक्रिया पर कुछ कहा जा सकता है. अपराधशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए यह आलेख कुछ काम का हो सकता है.

मौत डूबने से
पोस्टमार्टम की शुरुआती रिपोर्ट में यही कहा गया है कि उनकी मौत दुर्घटनावश डूबने से हुई. पता नहीं क्यों और कैसे डूबने के पहले ये विशेषण दुर्घटनावश लगाया गया. आमतौर पर यह काम पोस्टमार्टम करने वाले मेडिकल पर्सन करते नहीं हैं. ये काम वे मामले की जांच करने वाले पुलिस अधिकारी के लिए छोड़ते हैं. वे आगे की जांच में देखते हैं मृतक डूबा दुर्घटनावश है या और कोई कारण है. अब ये बात अलग है कि पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने शरीर पर चोट वगैरह के निशान देखे हों, लेकिन शुरुआती सूचना में ये बात फिलहाल सामने है नहीं.

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डूबने से मौत पर क्या कह गए हैं फॉरेंसिक विज्ञानी
विश्वप्रसिद्ध फॉरेंसिक विशेषज्ञ हैरी सोडरमॅन, जॉन जे ओकॉनेल और चार्ल्स ई ओहारा ने अपनी किताब मॉडर्न क्रिमिनल इनवेस्टिगेशन में एक अध्याय डूबने से मौत पर भी लिखा है. पेज 283 पर इस अघ्याय की शुरुआती पंक्ति है कि डूबना आत्महत्या का सबसे सामान्य प्रकार है. इसीलिए डूबने से हुई मौतों के मामले में हर पेशेवर को इस संदेह को दूर करना जरूरी हो जाता है. यानी कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर दुबई की पुलिस ने इस लिहाज़ से भी जांच पड़ताल करना जरूरी समझा हो. शाम तक इस मामले में रुक-रुक कर ही सूचनाएं मिल रही हैं. देर सबेर विशेषज्ञ इस आत्महत्या वाले पहलू के संदेह को भी दूर कर लेंगे.

मौत के सभी संभावित कारणों को देखना मज़बूरी होती है
डूबने से मौत के मामले में बड़े मोटे-मोटे उपाय हैं. अगर किसी की हत्या के बाद उसे पानी में डाला जाए तो उसके फेफड़ों में पानी नहीं मिलता. अगर दुर्घटनावश या आत्महत्या का मामला हो तो फेफड़ों में पानी मिल जाता है. वैसे डूबने से हुई मौतों की जांच के लिए मृतक के दिल के बाएं हिस्से के खून की रासायनिक जांच भी की जाती है. लेकिन यहां नहाने के टब में शव मिलने का मामला बताया जा रहा है सो हो सकता है कि दिल के बाएं हिस्से के खून में इस तरह के सोडियम क्लोराइड टेस्ट की जरूरत न समझी जाए.

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आत्महत्या का संदेह खारिज करने में काम आएंगे कुछ परीक्षण
अभी तो नहीं लेकिन अगर मामला जटिल बना तो आगे यह जरूर देखा जाएगा कि मृतक ने एल्कोहल के अलावा कोई और दवा तो नहीं ली थी. इसीलिए खून के परीक्षण काम आएंगे. पोस्टमार्टम के मामलों में अनुभवी डॉक्टर वीके मित्तल ने बातों बातों में बताया कि सिर्फ अल्कोहल से शरीर इतना ढीला नहीं हो पाता कि डूबने समय स्वाभाविक प्रतिरोध की क्षमता बहुत क्षीण हो जाए. लेकिन किसी नशे की दवा के साथ यह क्षमता तीन से चार गुनी कम हो जाती है. एल्कोहल और नशीली दवा के एक साथ असर की प्रवृत्ति को पोटेंसिएशन कहते हैं. इस स्थिति में मृतक डूबने से होने वाले कष्ट के स्वाभाविक बचाव की प्रतिक्रिया करने में अक्षम हो जाता है.

परम नहीं है कोई भी विज्ञान
जिस तरह कोई भी विज्ञान परम नहीं है उसी तरह फॉरेंसिक साइंस भी परम नहीं है. लेकिन विज्ञान हमारा ज्ञान बढ़ाता रहता है और बहुत से रहस्यों को समझने में हमारी मदद करता है. और आजकल तो ज्ञान की विभिन्न शाखाएं यानी विज्ञान एक दूसरे विज्ञानों से मदद मांगती रहती हैं. श्रीदेवी की मृत्यु की गुत्थी के लिए भी अनुसंधानकर्ताओं को फॉरेंसिक साइंस के अलावा अपराधशास्त्र, असमान्य मनोविज्ञान और सामाजिक विघटन के अकादमिक विद्वानों की मदद लेनी पड़ सकती है.

साभारः  सुधीर जैन के फेसबुक वॉल से. लेखक पेशे से पत्रकार और अपराधशास्त्री हैं. 

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं)