Unnao Rape Case: सुप्रीम कोर्ट ने 2017 के उन्नाव बलात्कार मामले में पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर झटका दिया है. उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें रेप केस में कुलदीप सिंह सेंगर की आजीवन कारावास की सजा को निलंबित कर दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 15 मई को एक आदेश में दिल्ली उच्च न्यायालय से याचिका पर नए सिरे से फैसला करने को भी कहा.
इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने की. पीठ ने दिल्ली हाई कोर्ट को ये निर्देश भी दिया कि वह सेंगर की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास के खिलाफ दायर मुख्य याचिका पर दो महीने के भीतर फैसला करने का प्रयास करे. ये सुनवाई सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) की ओर से दायर अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए की गई.
सुनवाई के दौरान, सेंगर की ओर से सीनियर एडवोकेट एन. हरिहरन ने दलील दी कि इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि कथित घटना के समय पीड़िता नाबालिग नहीं थी. CBI की ओर से भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस दलील का खंडन किया. तुषार मेहता ने यह भी तर्क दिया कि हाई कोर्ट का यह मानना गलत था कि POCSO एक्ट के दायरे में एक MLA “सरकारी कर्मचारी” (public servant) नहीं होता है.
जस्टिस बागची ने भी इस मुद्दे पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से सहमति जताई और कहा कि हम हाई कोर्ट द्वारा अपनाए गए अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण का समर्थन नहीं करते. उन्होंने जोर दिया कि POCSO एक्ट बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाया गया था. तुषार मेहता ने ये भी तर्क दिया कि एक MLA हमेशा एक प्रभावशाली स्थिति में होता है.
2017 के उन्नाव बलात्कार मामले में दोषी करार दिए जा चुके सेंगर की सजा दिल्ली हाईकोर्ट ने निलंबित कर दी थी. हाई कोर्ट ने कहा था कि ‘यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम’ (POCSO Act) की धारा 5(c) और ‘भारतीय दंड संहिता’ (IPC) की धारा 376(2) के तहत गंभीर अपराध के प्रावधान इस मामले में लागू नहीं होते, क्योंकि सेंगर को “लोक सेवक” की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.
इस फैसले को चुनौती देते हुए, CBI ने सुप्रीम कोर्ट में यह तर्क दिया कि कि हाई कोर्ट के इस फैसले से POCSO Act के सुरक्षा तंत्र पर बुरा असर पड़ा है. CBI ने अपनी याचिका में कहा कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए आजीवन कारावास की सजा को निलंबित करने का फैसला कानूनी रूप से सही नहीं ठहराया जा सकता.जांच एजेंसी ने हाई कोर्ट के इस निष्कर्ष पर कड़ी आपत्ति जताई कि POCSO Act की धारा 5(c) के तहत एक MLA “लोक सेवक” की परिभाषा के दायरे में नहीं आता.
मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने दिल्ली हाई कोर्ट से इस पर विचार करने को भी कहा कि क्या किसी विधायक को यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत मुकदमा चलाने के दौरान भी लोक सेवक माना जा सकता है.
बता दें कि पिछले साल 29 दिसंबर को उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगा दी थी जिसमें सेंगर की उम्रकैद की सजा को निलंबित किया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सेंगर को हिरासत से रिहा नहीं किया जाएगा.
अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि उच्च न्यायालय के लिए मुख्य याचिका पर शीघ्रता से निर्णय लेना संभव नहीं है तो उसे वहां ग्रीष्मकालीन अवकाश शुरू होने से पहले सेंगर की उस याचिका पर आदेश पारित करना चाहिए जिसमें मामले में आजीवन कारावास को निलंबित करने की मांग की गई है.
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