Opinion: गोभक्ति की राजनीति या 'राजनीतिक गोभक्ति'? गविष्ठि यात्रा पर उठते सवाल
गविष्ठि यात्रा के जरिए गोरक्षा का संदेश देने निकले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बयानों ने नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है. आलोचकों का आरोप है कि यात्रा गाय से ज्यादा राजनीति पर केंद्रित दिख रही है, जबकि गोमांस तस्करी से जुड़े मामलों पर उनकी चुप्पी भी सवाल खड़े कर रही है.
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की 'गविष्ठि यात्रा' चर्चा का विषय बनी हुई है. (photo credit, AI)
Opinion: उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की 'गविष्ठि यात्रा' चर्चा का विषय बनी हुई है. आधिकारिक तौर पर इस यात्रा का उद्देश्य गोसंरक्षण और गोरक्षा के मुद्दे को जन-जन तक पहुंचाना बताया जा रहा है, लेकिन यात्रा के दौरान दिए जा रहे राजनीतिक बयानों ने इसके वास्तविक मकसद को लेकर बहस छेड़ दी है.
पिछले कुछ महीनों में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा किया है. उनके भाषणों में गाय और गोसंरक्षण की चर्चा जरूर होती है, लेकिन उतनी ही प्रमुखता से उत्तर प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी निशाना साधा जाता है. यही कारण है कि विरोधी दल जहां इस यात्रा का स्वागत कर रहे हैं, वहीं बीजेपी समर्थक इसे राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बता रहे हैं.
बहस का सबसे बड़ा कारण वह बयान रहा, जिसमें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मुस्लिम समाज और मुगल शासकों के संदर्भ में गोभक्ति की बात कही. उनके समर्थक इसे सामाजिक समरसता का संदेश बताते हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि ऐसे वक्त में जब गोतस्करी और अवैध मांस कारोबार के कई मामले सामने आते रहे हैं, तब इस तरह के सामान्यीकृत दावे वास्तविक स्थिति को नजरअंदाज करते हैं.
हाल ही में बुलंदशहर से सामने आया एक मामला भी इसी बहस को नया आयाम देता है. प्रशासन ने एक मीट प्रोसेसिंग इकाई के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उसे सील किया. जांच एजेंसियों द्वारा की गई कार्रवाई और उससे जुड़े आरोपों ने फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि गोरक्षा की बात करने वाले विभिन्न सामाजिक और धार्मिक समूह ऐसे मामलों पर कितनी मुखरता दिखाते हैं. आलोचकों का तर्क है कि यदि गोरक्षा ही सर्वोच्च प्राथमिकता है तो फिर राजनीतिक पहचान से परे हर मामले पर समान रूप से प्रतिक्रिया होनी चाहिए.
गोहत्या और गोतस्करी के खिलाफ लिए गए एक्शन
दूसरी तरफ, उत्तर प्रदेश सरकार अपने कार्यकाल में गोहत्या और गोतस्करी के खिलाफ की गई कार्रवाइयों को प्रमुख उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती रही है. सरकार का दावा है कि अवैध स्लॉटरहाउसों पर कार्रवाई, गोतस्करी के खिलाफ अभियान और गौशालाओं के विस्तार जैसे कदमों से प्रदेश में गोसंरक्षण को संस्थागत मजबूती मिली है. यही वजह है कि सरकार समर्थक वर्ग यह सवाल उठा रहा है कि इन पहलों की चर्चा धार्मिक मंचों पर अपेक्षाकृत कम क्यों दिखाई देती है.
गविष्ठि यात्रा को लेकर एक और महत्वपूर्ण सवाल उसकी राजनीतिक टाइमिंग को लेकर भी उठ रहा है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही यात्रा का विस्तार और राजनीतिक स्वर अधिक तीखा होता दिखाई दे रहा है. इससे विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का नया दौर शुरू हो गया है. भाजपा इसे विपक्ष को लाभ पहुंचाने वाला अभियान बताती है, जबकि यात्रा के समर्थक इसे जनजागरण का प्रयास करार देते हैं.
दरअसल, किसी भी धार्मिक या सामाजिक अभियान की विश्वसनीयता तभी मजबूत होती है जब उसके संदेश और व्यवहार में समानता दिखाई दे. अगर गोरक्षा उद्देश्य है तो चर्चा केवल राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि गोवंश संरक्षण से जुड़े सभी पहलुओं पर समान दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए. यही कारण है कि गविष्ठि यात्रा को लेकर समर्थन और आलोचना दोनों साथ-साथ चल रहे हैं.
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह अभियान वास्तव में गोसंरक्षण के मुद्दे को केंद्र में रख पाता है या फिर राजनीतिक बहसों के बीच उसकी मूल भावना पीछे छूट जाती है. फिलहाल इतना साफ है कि गविष्ठि यात्रा ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नई चर्चा जरूर पैदा कर दी है.
(लेखक डॉ. अभय पाण्डेय दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक विषयों पर लेखन करते रहते हैं.)
ब्रेकिंग न्यूज और लाइव न्यूज अपडेट के लिए हमें फेसबुक पर लाइक करें या ट्विटर पर फॉलो करें. India.Com पर विस्तार से पढ़ें मनोरंजन की और अन्य ताजा-तरीन खबरें