नई दिल्ली. गूगल सोमवार को चिपको आंदोलन की 45वीं सालगिरह मना रहा है. इसके लिए उसने डूडल बनाया हुआ है. बता दें कि साल 1973 में यह आंदोलन शुरू हुआ था. पेड़ कटने से बचाने के लिए गौरा देवी के नेतृत्व में महिलाएं पेड़ों से चिपक गई थीं. उन्होंने पड़ों पर अपना परंपरागत अधिकार दिखाया था. इसे बिल्कुल गांधीवादी तरीके से चलाया गया. इस आंदोलन में लोग पेड़ों को बचाने के लिए उनसे चिपक या लिपट जाते थे, इसलिए इसका नाम चिपको आंदोलन पड़ा. बाद में सुंदरलाल बहुगुणा और चंडीप्रसाद भट्ट ने इस आंदोलन को बड़े रूप में चलाया. Also Read - Google Doodle On Pu La Deshpande: कौन थे पुरुषोत्तम लक्ष्मण देशपांडे, जिन्हें Google ने डूडल बनाकर किया याद

यह आंदोलन साल 1973 में अप्रैल के महीने में ऊपरी अलकनंदा घाटी के मंडल गांव में शुरू हुआ था. इसके बाद यह हिमालय से सटे उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में फैल गया. उस दौरान वन विभाग के ठेकेदार वनों को काटने का प्रयास करते थे तो ग्रामीण इसका विरोध करते थे. कुछ ही साल में इसने बड़ा रूप ले लिया. कहा जाता है कि जोधपुर के महाराजा ने पेड़ों को काटने का फैसला सुनाया तो बिशनोई समाज की महिलाएं पेड़ों से चिपक गई थीं. ऐसे में इस आंदोलन में बिशनोई समाज की भी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है. Also Read - गूगल ने जोहरा सहगल की याद में बनाया डूडल, जानिए आज का दिन क्यों है अहम

आंदोलन के दौरान नारा दिया गया था, ‘क्या है जंगल के उपकार, मिट्टी पानी और बयार’. ‘मिट्टी पानी और बयार, जिंदा रहने के आधार.’ इस आंदोलन ने देश की राजनीति के एजेंडे में पर्यावरण को भी ला दिया. Also Read - Google Doodle Arati Saha: जानें, कौन थीं 'भारत की जलपरी' Arati Saha, जिन्‍हें गूगल ने किया याद

इस आंदोलन को साल 1987 में सम्यक जीविका पुरस्कार दिया गया. इतना ही नहीं, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हिमालयी क्षेत्रों में 15 साल तक पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी थी. इसके बाद यह आंदोलन बिहार, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और विंध्याचल तक फैल गया.