नई दिल्लीः Google ने आज अपना डूडल देश के प्रसिद्ध समाजसेवी मुरलीधर देवीदास आमटे (बाबा आमटे) को समर्पित किया है. गूगल ने आज के अपने डूडल में बाबा आमटे की तस्वीरों की स्लाइड बनाई है, जिसमें बाबा आमटे द्वारा किए गए सामाजिक कार्यों की झांकी दिख रही है. जैसे-जैसे आप स्लाइड को आगे बढ़ाते जाएंगे तस्वीरों में बाबा आमटे कुष्ट रोगियों की सेवा करते और कई आंदोलनों की अगुवाई करते दिखाई देते हैं.

आज ही दिन यानी 26 दिसंबर को सन 1914 में महाराष्‍ट्र के वर्धा जिले के हिंगणघाट गांव में एक धनी परिवार के यहां बाबा आमटे का जन्‍म हुआ था. उनका पूरा नाम मुरलीधर देवीदास आमटे है. इनके उनके पिता देवीदास हरबाजी आमटे शासकीय सेवा में लेखपाल थे. बरोड़ा से पांच-छह मील दूर गोरजे गांव में उनकी जमींदारी थी. उनका बचपन बहुत ही ठाट-बाट से बीता. वे सोने के पालने में सोते थे और चांदी के चम्मच से उन्हें खाना खिलाया जाता था. बचपन में वे किसी राज्य के राजकुमार की तरह रहे. रेशमी कुर्ता, सिर पर ज़री की टोपी और पांव में शानदार शाही जूतियाँ, यही उनकी वेष-भूषा होती थी जो उनको एक आम बच्चे से अलग कर देती थी. उनकी चार बहनें और एक भाई था. जिन युवाओं ने बाबा को कुटिया में सदा लेटे हुए ही देखा- शायद ही कभी अंदाज लगा पाए होंगे कि यह शख्स जब खड़ा रहा करता था तब क्या कहर ढाता था. अपनी युवावस्था में धनी जमींदार का यह बेटा तेज कार चलाने और हॉलीवुड की फिल्म देखने का शौकीन था. अंग्रेजी फिल्मों पर लिखी उनकी समीक्षाएं इतनी दमदार हुआ करती थीं कि एक बार अमेरिकी अभिनेत्री नोर्मा शियरर ने भी उन्हें पत्र लिखकर दाद दी.

गूगल डूडल प्रतियोगिता में जीतकर पा सकते हैं 5 लाख की स्कॉलरशिप

महात्‍मा गांधी से मिलने के बाद अपनाया अहिंसा का रास्‍ता
बाबा आमटे ने एम.ए.एल.एल.बी. तक की पढ़ाई की. उनकी पढ़ाई क्रिस्चियन मिशन स्कूल नागपुर में हुई और फिर उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय में क़ानून की पढ़ाई की और कई दिनों तक वकालत भी की. महात्मा गांधी और विनोबा भावे से प्रभावित बाबा आमटे ने सारे भारत का दौरा कर देश के गांवों में अभावों में जीने वालें लोगों की असली समस्याओं को समझने की कोशिश की. देश की आजादी की लड़ाई में बाबा आमटे अमर शहीद राजगुरु के साथी रहे थे. फिर राजगुरू का साथ छोड़कर गांधी से मिले और अहिंसा का रास्ता अपनाया. विनोबा भावे से प्रभावित बाबा आमटे ने सारे भारत का दर्शन किया. और इस दर्शन के दौरान उन्हें गरीबी, अन्याय आदि के भी दर्शन हुए और इन समस्याओं को दूर करने की अपराजेय ललक रूपी जलधि इनके हृदय में हिचकोरे लेने लगा.

वह घटना जिसके बाद करने लगे कुष्ठ रोगियों की सेवा
एक दिन बाबा ने एक कोढ़ी को धुआंधार बारिश में भींगते हुए देखा उसकी सहायता के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था. उन्होंने सोचा कि अगर इसकी जगह मैं होता तो क्या होता? उन्होंने तत्क्षण बाबा उस रोगी को उठाया और अपने घर की ओर चल दिए. इसके बाद बाबा आमटे ने कुष्ठ रोग को जानने और समझने में ही अपना पूरा ध्यान लगा दिया. वरोडा (जि. चंद्रपूर, महाराष्ट्र) पास घने जंगल में अपनी पत्नी साधनाताई, दो पुत्रों, एक गाय एवं सात रोगियों के साथ आनंद वन की स्थापना की. यही आनंद वन आज बाबा आमटे और उनके सहयोगियों के कठिन श्रम से आज हताश और निराश कुष्ठ रोगियों के लिए आशा, जीवन और सम्मानजनक जीवन जीने का केंद्र बन चुका है. मिट्टी की सौंधी महक से आत्मीय रिश्ता रखने वाले बाबा आमटे ने चंद्रपुर जिले, महाराष्ट्र के वरोडा के निकट आनंदवन नामक अपने इस आश्रम को आधी सदी से अधिक समय तक विकास के विलक्षण प्रयोगों की कर्मभूमि बनाए रखा. जीवनपर्यन्त कुष्ठरोगियों, आदिवासियों और मजदूर-किसानों के साथ काम करते हुए उन्होंने वर्तमान विकास के जनविरोधी चरित्र को समझा और वैकल्पिक विकास की क्रांतिकारी जमीन तैयार की.

आनन्दवन” का बजट आज करोड़ों में
आनन्दवन की महत्ता चारों तरफ फैलने लगी, नए-नए रोगी आने लगे और “आनन्दवन” का महामंत्र ‘श्रम ही है श्रीराम हमारा’ सर्वत्र गूँजने लगा. आज “आनन्दवन” में स्वस्थ, आनन्दमयी और कर्मयोगियों की एक बस्ती बस गई है. भीख माँगने वाले हाथ श्रम करके पसीने की कमाई उपजाने लगे हैं. किसी समय 14 रुपये में शुरु हुआ “आनन्दवन” का बजट आज करोड़ों में है. बाबा आमटे ने “आनन्दवन” के अलावा और भी कई कुष्ठरोगी सेवा संस्थानों जैसे, सोमनाथ, अशोकवन आदि की स्थापना की है जहाँ हजारों रोगियों की सेवा की जाती है और उन्हें रोगी से सच्चा कर्मयोगी बनाया जाता है. सन 1985 में बाबा आमटे ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत जोड़ो आंदोलन भी चलाया था. इस आंदोलन को चलाने के पीछे उनका मकसद देश में एकता की भावना को बढ़ावा देना और पर्यावरण के प्रति लोगों का जागरुक करना था.