नई दिल्लीः फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव में बसपा के सपा उम्मीदवार का समर्थन करने के पीछे कई तात्कालिक कारणों के साथ-साथ स्थानीय कारण हैं, जिससे दोनों धुर विरोधी दल एक साथ आने पर मजबूर हुए हैं. बहुजन समाज पार्टी ने इन दोनों सीटों पर पहले ही अपने उम्मीदवार खड़े नहीं करने की घोषणा की थी. ऐसे में संभावना बन रही थी कि यूपी की राजनीति के दोनों धुर विरोधी दल आने वाले समय में एक साथ आ सकते हैं, लेकिन बसपा खुलेआम सपा उम्मीदवार के समर्थन की घोषणा करेगी, ऐसी उम्मीद किसी ने नहीं लगाई थी. आइए हम आपको ऐसे ही कारणों के बारे में बताते हैं जिससे कि बसपा, सपा उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालने की अपील करने पर मजबूर हुई. Also Read - Bihar Polls: औवैसी का दावा- PM मोदी बिहार में BJP विधायक को बनाना चाहते हैं मुख्यमंत्री, नीतीश कुमार को...

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अतीक अहमद का मैदान में कूदना Also Read - बिहार में मुफ्त वैक्सीन बांटने के वादे पर राहुल गांधी का बीजेपी पर हमला, RJD बोली- इसमें भी चुनावी सौदेबाजी, छी-छी

माफिया से नेता बने अतीक अहमद ने फूलपुर की लड़ाई दिलचस्प बना दी है. अतीक अहमद ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर ताल ठोंका है. जानकार मानते हैं कि पूर्व में सपा के करीबी रहे अतीक चुनाव जीतने नहीं बल्कि सपा के खेल खराब करने के लिए मैदान में कूदे हैं. सवाल ये भी उठे रहे हैं कि अतीक अहमद ने जल्दबाजी में क्यों नामांकन किया. बदली परिस्थिति में बसपा और सपा को करीब आने का मौका दिया.

सपा में अखिलेश का नेतृत्व

सपा के समर्थन में बसपा के खुलकर आने के पीछे एक दूसरा सबसे अहम कारक सपा में मुलायम युग का अंत हो जाना है. आज सपा का नेतृत्व अखिलेश यादव के हाथों में है और वह लंबे समय से भाजपा को रोकने के लिए बसपा को साथ लाने की वकालत करते रहे हैं. राम जन्म भूमि आंदोलन के बाद 1993 में यूपी में भाजपा के प्रसार को रोकने के लिए इसी तरह कांसीराम के नेतृत्व में बसपा और सपा ने हाथ मिलाया था. तब सपा-बसपा गठबंधन को 176 और भाजपा को 177 सीटें मिली थीं. 1995 में गेस्ट हाउस कांड के बाद गठबंधन टूटा तो दोनों दल कभी साथ नहीं आ पाए.

बसपा उम्मीदवार को राज्यसभा भेजने में सहयोगी देगी सपा

बसपा प्रमुख मायावती और सपा प्रमुख अखिलेश यादव से हरी झंडी मिलने के बाद दोनों दलों के बीच समर्थन की शर्तों पर विस्तृत बातचीत हुई है. इसमें दोनों ही पक्षों ने आगामी राज्यसभा चुनाव और विधान परिषद चुनाव में एक-दूसरे के समर्थन पर सहमति जताई. यह फैसला लिया गया कि सपा राज्यसभा चुनाव में बसपा का समर्थन करेगी और सपा विधान परिषद चुनाव में समाजवादी उम्मीदवारों को अपना समर्थन देगी. बता दें, सपा अध्यक्ष अखिलेश ने वर्ष 2017 में ही सार्वजनिक तौर पर बसपा से हाथ मिलाने की इच्छा जताई थी. इसके बाद से गेंद बसपा सुप्रीमो मायावती के पाले में थी.

दोनों सीटों पर सपा के मजबूत उम्मीदवार

गोरखपुर और फूलपुर दोनों सीटों पर सपा ने मजबूत उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं. फूलपुर में तो भाजपा ने कौशलेंद्र पटेल को उम्मीदवार बनाया है लेकिन उनके बाहरी होने का नुकसान भी पार्टी को उठाना पड़ सकता है. दूसरी तरफ सपा ने भी यहां से नागेंद्र सिंह पटेल को उम्मीदवार बनाया है. इस सीट पर पटेल समुदाय का वर्चस्व है. इसी तरह गोरखपुर में भी बसपा का समर्थन पाने के बाद समाजवादी पार्टी में उम्मीद बढ़ गई है. गोरखपुर संसदीय सीट पर निषाद समुदाय काफी प्रभावी हैं. सपा ने निषाद समुदाय से उम्मीदवार खड़ा करके पहले ही माइलेज ले लिया था. दूसरी ओर बसपा का साथ मिलने से उसे बसपा के कैडर वोट और अल्पसंख्यकों के पूरे वोट मिलने की उम्मीद है.

बेहद अहम हैं दोनों सीटें

फूलपुर से केशव प्रसाद मौर्य और गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ के इस्तीफा देने के बाद उपचुनाव होना है. फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा सीट पर 11 मार्च को उपचुनाव है और 14 मार्च मतगणना कर नतीजे घोषित किए जाएंगे. बीजेपी ने फूलपुर लोकसभा सीट के लिए कौशलेंद्र पटेल को अपना उम्मीदवार बनाया है. तो वहीं सपा ने नागेंद्र पटेल पर दांव लगाया है. जबकि कांग्रेस ने मनीष मिश्रा को मैदान में उतारा है. बाहुबली और सपा के पूर्व सांसद अतीक अहमद ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर फूलपुर लोकसभा सीट पर नामांकन दाखिल किया है. पिछले विधानसभा चुनाव में सपा को 28 प्रतिशत और बहुजन समाजवादी पार्टी को 22 प्रतिशत वोट मिले थे. दोनों को जोड़ ले तो ये 50 प्रतिशत वोट हो जाता है ऐसी स्थिति में बीजेपी के लिए उपचुनाव में सपा के प्रत्याशियों को हराना बेहद मुश्किल हो जाएगा. अगर दोनों सीटों पर सपा उम्मीदवार जीतते हैं तो यह एक बड़ी मनोवैज्ञानिक जीत होगी.