नई दिल्ली. पेट्रोल-डीजल के लगातार बढ़ते दाम से परेशान आम आदमी और विपक्ष के हमलों के बीच केंद्र सरकार ने ईंधन की कीमतें कम करने का फॉर्मूला ढूंढ़ निकाला है. यदि सब कुछ सही रहा तो जल्द ही सरकार पेट्रोल और डीजल की कीमतों को फिर से नियंत्रित कर पाएगी. दरअसल, केंद्र सरकार ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में उतार-चढ़ाव के बावजूद तेल कंपनियों द्वारा कीमतें न घटाने और मुनाफा लेते रहने पर रोक लगाने का उपाय तलाशा है. सरकार ऑयल एंड नेचुरल गैस एजेंसी (ओएनजीसी) जैसी घरेलू तेल कंपनियों पर ‘सेस’ यानी उपकर लगाने का विचार कर रही है. इसके तहत कच्चे तेल का भाव यदि 70 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर जाते ही कंपनियों पर सेस प्रभावी हो जाएगा. इसका मतलब यह कि तेल कंपनियों को 70 डॉलर प्रति बैरल के भाव से ऊपर की कमाई पर टैक्स देना होगा.

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सेस लगाने से कंपनियों पर बढ़ेगा दबाव
सरकार की मंशा है कि तेल कंपनियों पर सेस लगाए जाने की व्यवस्था से पेट्रोल-डीजल की कीमतों को एक स्तर से ऊपर ले जाने पर रोक लग सकेगी. अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव होने के बावजूद देश में ईंधन की कीमतें नियंत्रित रह सकेंगी. साथ ही कच्चे तेल का दाम 70 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाने के बाद लगने वाले सेस से सरकार को अतिरिक्त राजस्व की भी प्राप्ति हो सकेगी. सेस लगाने का एक फायदा यह भी होगा कि तेल कंपनियां पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर स्वतः भी नियंत्रण बनाए रखेंगी. आधिकारिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सरकार की योजना सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्र के तेल उत्पादकों पर उपकर लगाने की है. इससे सार्वजनिक क्षेत्र के तेल उत्पादकों द्वारा सेस की व्यवस्था का विरोध नहीं किया जा सकेगा. इससे पहले भी तेल कंपनियों पर सेस लगाने का फॉर्मूला वर्ष 2008 में सरकार लेकर आई थी, लेकिन कुछ निजी कंपनियों के विरोध के कारण तब यह योजना अमल में नहीं आ सकी थी.

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ग्राहकों को तत्काल राहत के लिए वैट घटाने का फॉर्मूला
पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों को लेकर सबसे ज्यादा परेशान आम आदमी को तत्काल राहत देने के उपायों पर भी सरकार विचार कर रही है. इसके तहत राज्य सरकारों को कहा गया है कि वे पेट्रोल-डीजल पर से वैट यानी मूल्यवर्द्धित कर घटाएं. इससे देश के सभी राज्यों में तेल की खुदरा कीमतों में कमी आएगी और तत्काल ग्राहकों को इससे लाभ होगा. बता दें कि ईंधन उत्पादक कंपनियों पर सेस लगाने का यह फॉर्मूला, भारत से पहले भी कई देशों में लागू किया गया है. ब्रिटेन ने वर्ष 2011 में ऐसी व्यवस्था की थी. ब्रिटेन में कच्चे तेल का दाम 75 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाने पर तेल कंपनियों पर सेस लगाने की व्यवस्था लागू है. इसी तरह चीन में भी कच्चे तेल का दाम 55 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर जाने पर तेल कंपनियों को सेस अदा करना पड़ता है. चीन में यह टैक्स प्रणाली वर्ष 2006 से ही लागू है.

पेट्रोल-डीजल को जीएसटी में लाने पर भी विचार
पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए कई संस्थाएं और संगठन सरकार से लगातार यह मांग कर रही है कि ईंधन पदार्थों को भी गुड्स एंड सर्विस टैक्स सिस्टम यानी जीएसटी प्रणाली के तहत लाया जाए. इससे पेट्रो पदार्थों का मूल्य अप्रत्याशित रूप से कम होने की संभावना है. बीते दिनों नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने भी पेट्रोल-डीजल और बिजली को जीएसटी में लाने की सलाह दी थी. उन्होंने पेट्रो पदार्थों से ज्यादा कमाई होने की बात पर कहा था कि केंद्र सरकार को कमाई के साधन खोजते हुए जनता को पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत देना चाहिए. राजीव कुमार ने राज्यों से भी कहा था कि वे पेट्रोल-डीजल को लेकर ज्यादा लालच न दिखाएं और वैट में कमी करें. कुमार ने राज्यों को पेट्रो पदार्थों पर 10 से 15 फीसदी तक कर कटौती करने की सलाह दी थी.