इंदौर: उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2002 के गोधरा कांड के बाद गुजरात में भड़के एक दंगे के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे 15 दोषियों को इस शर्त पर जमानत दी है कि उन्हें मध्य प्रदेश के दो शहरों-इंदौर और जबलपुर में रहकर सामुदायिक सेवा करनी होगी. शीर्ष अदालत के आदेश की रोशनी में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण इस नये प्रयोग को अमली जामा पहनाने का खाका तैयार करने के लिये सोच-विचार में जुट गया है. अदालत के आदेश के मुताबिक छह दोषियों का एक समूह इंदौर में रहकर सामुदायिक सेवा करेगा.

उच्चतम न्यायालय ने दोनों जिलों के विधिक सेवा प्राधिकरणों से यह भी कहा है कि वे इन दोषियों को उचित रोजगार दिलाने में मदद करें. इंदौर के जिला विधिक सहायता अधिकारी सुभाष चौधरी ने बुधवार को “पीटीआई-भाषा” से कहा, “मुझे समाचार पत्रों के जरिये जानकारी मिली है कि उच्चतम न्यायालय के आदेश के मुताबिक गुजरात दंगों के कुछ दोषी जमानत की शर्तों के तहत जेल से छूटकर इंदौर आने वाले हैं. हम इस आदेश की रोशनी में राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के आगामी दिशा-निर्देशों का पालन करेंगे.”

इस बीच, गुजरात दंगों के दोषियों को सामुदायिक सेवा की शर्त के साथ जमानत दिये जाने के उच्चतम न्यायालय के आदेश की स्थानीय न्यायिक जगत में चर्चा है. इस आदेश का स्वागत भी किया जा रहा है. न्यायिक क्षेत्र में काम करने वाले गैर सरकारी संगठन “न्यायाश्रय” के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता पंकज वाधवानी ने कहा, “गुजरात दंगों के दोषियों को सामुदायिक सेवा की शर्त के साथ जमानत का लाभ दिये जाने के आदेश के जरिये उच्चतम न्यायालय ने सुधारात्मक दंड के सिद्धांत के मुताबिक नजीर पेश की है. यह न्यायिक सिद्धांत कहता है — पाप को मारो, पापी को नहीं.”

उन्होंने कहा, “अदालतों के इस प्रकार के आदेशों से दोषियों को अपने भीतर झांककर खुद में सुधार करने का अवसर मिलेगा और वे जेल के माहौल से दूर रहकर समाज की मुख्यधारा से जुड़ भी सकेंगे.” गुजरात दंगों के मामले में 15 दोषियों को आणंद जिले के ओड कस्बे में हुए नरसंहार के सिलसिले में उम्रकैद की सजा सुनायी गयी थी. इस दंगे में 23 लोगों को जिंदा जला दिया गया था. प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे, न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ ने इस मामले के 15 दोषियों को दो समूहों में बांट दिया है. जमानत की शर्तों के तहत ये दोषी गुजरात से बाहर रहेंगे और उन्हें मध्यप्रदेश के दो शहरों-इन्दौर और जबलपुर में निवास करते हुए सामुदायिक सेवा करनी होगी. इन सभी दोषियों को नियमित रूप से इन शहरों के संबंधित पुलिस थानों में हाजिरी भी देनी होगी.

पीठ ने कहा, ‘‘वे दोषी वहां (इन्दौर और जबलपुर में) एक साथ नहीं रहेंगे. उन्हें जमानत की शर्त के अनुसार सप्ताह में छह घंटे सामुदायिक सेवा करनी होगी.’’ पीठ ने कहा कि इन सभी को अपनी सामुदायिक सेवाओं के बारे में संबंधित जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को प्रमाण पत्र भी सौंपना होगा. पीठ ने मध्यप्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को तीन महीने बाद अपनी रिपोर्ट पेश करने का निर्देश भी दिया जिसमें उसे बताना होगा कि दोषियों ने जमानत की शर्तों का पालन किया है या नहीं?