नई सदी के पहले दशक का शुरुआती साल था. छठवीं-सातवीं में पढ़ रहा था कि एक नशा लग गया. उसी के इर्दगिर्द में जागता या सोता. उसी के लालच से खाना खाता या फिर पढ़ता. लगता था जो भी छोटे-बड़े सपने उसी के परिधी में पहुंचने पर पूरे होंगे. जैसे पृथ्वी का वायुमंडल पृथ्वी के साथ ही घूमता है, वैसे ही मेरी जिंदगी उसी नशे के साथ घूमती थी. वह नशा किसी और चीज का नहीं क्रिकेट की दुनिया के भगवान मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर का था. Also Read - Road Safety World Series T20 INDL vs BANL: पुराने अंदाज में दिखी सचिन-सहवाग की जोड़ी, वीरू ने 20 गेंदों में जड़ी फिफ्टी; 10 विकेट से जीता भारत

सचिन से मेरा परिचय पापा ने कराया था और देखते ही देखते वह मेरे पहले और अंतिम हीरो बन गए. मैं बैट लेकर सोता था. सपने में कानपुर के ईडन गार्डन या दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में सचिन के साथ ओपनिंग करने उतरता था. मैं सचिन के पूरे स्ट्रांस को कॉपी करता. फिर शॉट खेलता और बड़बड़ता सिंगल भाग सचिन, सिंगल भाग. तबतक बगल में सो रही मां या पापा जगा देते. क्या हुआ. कितना रन बनाए. और मैं जगता, शर्माता फिर सो जाता. अगले दिन लोग मुझे चिढ़ाते. Also Read - Road Safety World Series 2021: जानें TV पर कैसे देख सकेंगे मैच, टाइमिंग और पूरा शेड्यूल

सचिन की वजह से क्रिकेट का जो नशा हुआ था, वह उन्हीं के रिटायरमेंट के साथ खत्म हो गया. इसके बाद वैसा नशा फिर कभी किसी चीज का नहीं हुआ. मैं सचिन की हर पारी देखता. कई मौके पर स्कूल/कोचिंग से लौटते समय मैच शुरू हो चुका होता तो किसी की खिड़की से, किसी दूकान के बाहर रुक कर या किसी भी जुगाड़ से हर बॉल देखते हुए घर पहुंचता. एक भी बॉल छूट जाता तो जैसे लगता कि जिंदगी का हिस्सा छूट गया है. लाइट कटने पर बैटरी का जुगाड़ करना, ट्रांसफार्मर जल जाता तो जीजाजी को बुलाकर उनके घर चले जाना या फिर कोई और जुगाड़ लगाना. वह सारी कवायद सिर्फ इसलिए करना कि मैच ही नहीं उसका एक गेंद मिस न हो. Also Read - Road Safety World Series 2021- IND L vs BAN L: आज से मैदान पर दिखेंगे पुराने दिग्गज, धमाल मचाएगी Sachin-Sehwag की जोड़ी

चंपक/कॉमिक्स/कार्टून नेटवर्क जैसी कई चीजों मुझे अछूती रह गईं, इसके पीछे की वजह क्रिकेट था. क्लास-6 से लेकर 16 नवंबर 2013 (सचिन के रिटायर्मेंट के दिन तक). या फिर उसके कुछ महीने बाद तक जबतक उनके बारे में छपता रहा, मैंने क्रिकेट सम्राट और क्रिकेट टुडे का हर अंक पढ़ा. हर अंक सहेजा. इसके पीछे पापा का भी हाथ होता. उन्हें पता था कि मुझे सचिन का नशा लग चुका है और वह जिस दिन क्रिकेट टुडे और क्रिकेट सम्राट का अंक बाजार में आता, उसी दिन उसे लेकर आते. और मैं सारा काम छोड़ कर सबसे पहले पूरे पन्ना पलटता कि सचिन का फोटो कितनी जगह छपी है.

उस दौर में इंटरनेट की पहुंच हमतक आज जैसी नहीं थी. पता भी नहीं था कि गूगल बाबा क्या-क्या सहेज रहे हैं. तो मैंने एक डायरी बनाई थी. उसमें मैं मैग्जिन और अखबार में छपने वाली सचिन की हर अच्छी फोटो को काटकर चिपका देता था. और वह डायरी उस समय की मेरी सबसे कीमती चीज हुआ करती थी. आज भी मैं उसे सहेज कर रखा हुआ हूं.

सचिन की वजह से ही मैं क्रिकेट खेलना शुरू किया. किसी को अभी तक जिंदगी में कॉपी करने की कोशिश की है तो वह शख्स भी सचिन ही हैं. घर में मोजे में गेंद को लटका कर बिल्कुल सचिन की तरह शॉट खेलने की प्रैक्टिस करना हो या फिर सिगरा स्टेडियम/डीएलडब्लू स्टेडियम का ग्राउंड हो या फिर बनारस के बीएचयू से लेकर घाट की सीढ़ी, गली मोहल्ले, छोटे-बड़े ग्राउंड हर जगह मैच/टूर्नामेंट मैं मैं सचिन बनने की कोशिश करता. कभी सफल होता तो खुश होता और असफल होता तो फिर घर पर आकर प्रैक्टिस करता. नशा था सचिन बनने का. यह नशा कानपुर स्पोर्टिंग क्लब तक मुझे पहुंचा दिया था.

सचिन बैंटिंग करते तो मैं रुक सा जाता. सचिन शॉट मारते तो जैसे लगता, वाह! शब्द अगर किसी चीज के लिए बना है तो वह इसी शॉट की तारीफ के लिए. सचिन आउट होते तो लगता जिंदगी का सबसे बड़ा दुख यही है. सचिन इंजर्ड होते तो लगता मेरे शरीर में कोई दिक्कत है. फिर सचिन के रिटायरमेंट की बात शुरू हुई तो दुख होने लगा. लगता सचिन ही तो क्रिकेट हैं. ये चले जाएंगे तो क्या होगा. फिर थोड़ा बड़ा होने लगा तो चीजें नॉर्मल होने लगी. लेकिन सचिन के लिए लगाव हमेशा से बना रहा. फिर साल 2013 के 11वें महीने की 16 तारीख आती है और सचिन क्रिकेट को अलविदा कह देते हैं. इसके बाद मैंने आजतक कोई मैच पूरा नहीं देखा. क्रिकेट को लेकर वैसा लगाव अब नहीं रहा.

आज सचिन का बर्थडे है. हैप्पी बर्थ डे गॉड जी. अब आपको देखते हैं तो लगता है कि आप एक अच्छे खिलाड़ी/क्रिकेटर ही नहीं, अच्छे इंसान भी हो. आप हीरो हो और रहोगे.

(इस आलेख में व्यक्त विचार, लेेखक के निजी हैं.)