नई दिल्ली| सुप्रीम कोर्ट में आज तीन तलाक से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई शुरू हो गई है. सुनवाई लगातार 10 दिनों तक चलेगी. पहले तीन दिन बचाव पक्ष को जिरह का मौका मिलेगा. तीन दिन सरकार इस पर अपना पक्ष रखेगी. मामले की सुनवाई पांच जजों की सदस्‍यता वाली बेंच कर रही है जिसकी अध्‍यक्षता मुख्‍य न्‍यायाधीश (सीजेआई) जे.एस. खेहर कर रहे हैं. खेहर के अलावा इस बेंच में जस्टिस कुरियन जोसफ, आरएफ नरीमन, यूयू ललित और अब्‍दुल नजीर भी शामिल हैं.Also Read - दिल्ली के कंस्ट्रक्शन मजदूरों को 5000 रुपये देगी केजरीवाल सरकार, जानें पूरी डिटेल

तीन तलाक पर सुनवाई कर रहे पांचों जज सिख, ईसाई, पारसी, हिंदू और मु‍स्लिम समुदायों का प्रतिनिधित्‍व करते हैं. बेंच ये देखेगी कि क्या यह धर्म का मामला है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर यह देखा गया कि यह धर्म का मामला है तो कोर्ट इसमें दखल नहीं देगी. लेकिन अगर यह धर्म का मामला नहीं निकला तो सुनवाई आगे चलती रहेगी. Also Read - Pollution: सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, क्या सेंट्रल विस्टा के कारण दिल्ली में प्रदूषण बढ़ रहा है, मेट्रो को भी दिया ये आदेश

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सलमान खुर्शीद- वकील सलमान खुर्शीद इस मामले में निजी तौर पर कोर्ट की मदद कर रहे हैं और एमिकस क्यूरी के तौर पर काम कर रहे हैं. उन्होंने कोर्ट में कहा कि तीन तलाक कोई मुद्दा ही नहीं है क्योंकि तलाक से पहले पति और पत्नी के बीच सुलह की कोशिश जरूरी है. अगर सुलह की कोशिश नहीं हुई तो तलाक क्या वैध नहीं माना जा सकता. एक बार में तीन तलाक नहीं बल्कि ये प्रक्रिया तीन महीने की होती है. तीन महीने का वक्त सुलह के लिए दिया जाता है.

कपिल सिब्बल- मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से कपिल सिब्बल ने भी खुर्शीद का समर्थन करते हुए कहा कि ये पर्सनल लॉ बोर्ड के अधिकार क्षेत्र का मामला है. सरकार इस पर कानून तो बना सकती है लेकिन कोर्ट को इसमें दखल नहीं देना चाहिए.

केंद्र का रुख- केंद्र की ओर से एएसजी पिंकी आनंद ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वह तीन तलाक का विरोध करती है क्योंकि ये समानता और महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ है. ये लैंगिंक समानता के भी खिलाफ है. अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी तीन तलाक पर 15 मई से कोर्ट में जिरह करेंगे.

जस्टिस रोहिंग्टन ने केंद्र से पूछा, इस मुद्दे पर आपका क्या स्टैंड है? पिंकी आनंद ने कहा, सरकार याचिकाकर्ता के समर्थन में है कि तीन तलाक असंवैधानिक है. कई मुस्लिम देश इसे खत्म कर चुके हैं.

तीन तलाक पर केंद्र सरकार के सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल:

1. धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत तीन तलाक, हलाला और बहु-विवाह की इजाजत संविधान के तहत दी जा सकती है या नहीं?
2. समानता का अधिकार और गरिमा के साथ जीने का अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में प्राथमिकता किसको दी जाए?
3. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को संविधान के अनुछेद 13 के तहत कानून माना जाएगा या नहीं?
4. क्या तीन तलाक, निकाह हलाला और बहु-विवाह उन अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत सही है, जिस पर भारत ने भी दस्तखत किए हैं?

ये है पूरा मामला

उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली शायरा बानो ने तीन तलाक और बहुविवाह के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है. पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दायर कर एक साथ तीन तलाक कहने और निकाह हलाला के चलन की संवैधानिकता को चुनौती दी थी. साथ ही मुस्लिमों की बहुविवाह प्रथा को भी चुनौती दी थी. अपनी याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत महिलाओं के साथ लैंगिक भेदभाव के मुद्दे, एकतरफा तलाक और संविधान में गारंटी के बावजूद पहले विवाह के रहते हुए मुस्लिम पति द्वारा दूसरा विवाह करने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट से विचार करने को कहा है.

वहीं , ट्रिपल तलाक मामले में सुप्रीम कोर्ट में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने लिखित जवाब दाखिल कर कहा है कि ट्रिपल तलाक के खिलाफ दाखिल याचिका सुनवाई योग्य नहीं है.