नई दिल्ली. दिल्ली हाई कोर्ट ने तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) के निदेशक मंडल में बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा की स्वतंत्र निदेशक के रूप में नियुक्ति के मामले में दखल देने से इनकार कर दिया. कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और न्यायमूर्ति सी हरिशंकर ने उस जनहित याचिका को स्वीकार नहीं किया जिसमें शशि शंकर की ओएनजीसी के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक (सीएमडी) के रूप में नियुक्ति भी रद्द करने की मांग की गई थी. Also Read - AgustaWestland: कोरोना का हवाला देने वाले क्रिश्चियन मिशेल की अंतरिम जमानत याचिका खारिज

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एनर्जी वॉचडॉग नाम के एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ने स्वतंत्र निदेशक पद पर नियुक्ति के लिए पात्रा की योग्यता पर भी सवाल उठाए और आरोप लगाया कि उन्हें नियुक्ति देने में उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया. एनजीओ की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता जयंत भूषण ने कहा कि बीजेपी के प्रवक्ता एक चिकित्सक हैं और ओएनजीसी का चिकित्सा के क्षेत्र से कोई लेनादेना नहीं है जो उन्हें बोर्ड में जगह दी गई. Also Read - Corona virus: कोर्ट ने वकीलों, वादियों से अदालत परिसर में भीड़भाड़ करने से बचने को कहा

केंद्र ने नियुक्ति का बचाव करते हुए कहा कि पात्रा वंचित तबके के लिए एक एनजीओ का सफलतापूर्वक संचालित कर रहे हैं जो उनके प्रबंधन कौशल को दिखाता है और इसलिए वह इस पद के लिए योग्य भी हैं. एनजीओ के वकील ने यह भी कहा कि पात्रा को 23 लाख रूपये प्रतिवर्ष के वेतन पर नियुक्त करना क्या एक व्यक्ति के प्रति कुछ ज्यादा ही सरकारी दरियादिली दिखाना नहीं है? ओएनजीसी के सीएमडी के रूप में शंकर की नियुक्ति का इस आधार पर विरोध किया गया कि उन्हें फरवरी 2015 में एक जांच के संबंध में छह महीने के लिए निलंबित कर दिया गया था. वह मामला पीएसयू द्वारा एक ठेका देने की जांच से जुड़ा है. Also Read - भड़काऊ भाषण देने वालों के खिलाफ FIR दर्ज करने को लेकर याचिका, कोर्ट ने केंद्र और दिल्ली सराकार से मांगा जवाब