नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने सर गंगाराम अस्पताल द्वारा अपने खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को खारिज कराने को लेकर दायर याचिका पर सोमवार को आम आदमी पार्टी की सरकार से जवाब तलब किया. न्यायमूर्ति सी हरि शंकर ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिये मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया और मामले को 11 अगस्त को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया. याचिका में अंतरिम राहत के तौर पर जांच और आगे की कार्यवाही पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया है, जिसपर अदालत में मंगलवार को बहस होगी. Also Read - Coronavirus In Delhi: दिल्ली में करीब 90 हजार लोग हुए स्वस्थ, 3371 लोगों की मौत

अस्पताल की ओर से अदालत में उपस्थित अधिवक्ता रोहित अग्रवाल ने कहा कि वह पांच जून को राजेंद्र नगर पुलिस थाने में भारतीय दंड संहिता की धारा-188 (सरकारी अधिकारी के आदेश की अवेहलना) के तहत दर्ज मामले और उसके बाद शुरू की गई प्रक्रिया को रद्द करने का अनुरोध करते हैं. याचिका में दिल्ली सरकार के तीन जून के आदेश को भी तत्काल रद्द करने का अनुरोध किया गया है जिसमें अस्पताल के कोविड-19 के संदिग्ध संक्रमितों/ संपर्क में आए लोगों की आरटी-पीसीआर जांच करने पर रोक लगाई गई थी. उल्लेखनीय है कि 675 बिस्तरों वाले ‘सर गंगाराम अस्पताल’ को दिल्ली सरकार ने कोविड-19 समर्पित अस्पताल घोषित किया है और 80 प्रतिशत बिस्तरों को कोरोना वायरस से संक्रमितों के लिए आरक्षित रखने का निर्देश दिया है. Also Read - एसिड पिलाने का मामला: पुलिस की धीमी जांच से नाराज कोर्ट ने कहा-ऐसा लग रहा है कि आरोपी को बचाया जा रहा है

प्राथमिकी के मुताबिक, शिकायतकर्ता दिल्ली स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ने आरोप लगाया कि अस्पताल दिशा-निर्देशों के अनुरूप कोविड-19 मरीजों के नमूने लेने के लिए आरटी-पीसीआर ऐप का इस्तेमाल नहीं कर रहा है जबकि प्रयोगशालाओं के लिए यह अनिवार्य है. शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि अस्पताल की ओर से महामारी रोग कानून-1897 के तहत जारी कोविड-19 नियमों का भी उल्लंघन किया गया. प्राथमिकी के मुताबिक, सीडीएमओ सह मिशन निदेशक मध्य ने उल्लेख किया है कि तीन जून तक सर गंगाराम अस्पताल आरटी-पीसीआर ऐप का इस्तेमाल नहीं कर रहा था जो महामारी रोग कोविड-19 नियमन-2020 अधिनियम का साफ तौर पर उल्लंघन है. Also Read - ट्यूशन फीस माफ करने को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर, जानिए क्या है पूरा मामला 

उल्लेखनीय है कि जांच प्रक्रिया को सुचारु तरीके से करने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने समर्पित आरटी-पीसीआर मोबाइल ऐप लॉन्च किया है जिसमें प्रयोगशालाओं को नमूना लेने के साथ जानकारी भरनी होती है. इन्हीं निर्देशों के तहत दिल्ली सरकार ने भी सभी प्रयोगशालाओं व नमूने एकत्र करने वाले केंद्रों के लिए भी इस ऐप को डाउनलोड करना अनिवार्य किया है.

याचिका में अस्पताल ने कहा, ‘‘ आदेश की अवज्ञा मात्र भारतीय दंड संहिता (भादंसं) की धारा-188 के तहत अपराध के लिए पर्याप्त नहीं है लेकिन रुकावट पैदा करना, पीड़ा देना या किसी व्यक्ति को चोट पहुंचाना या किसी की जान, स्वास्थ्य, सुरक्षा को खतरे में डालना या दंगा फैलाना या बलवा करना भादंसं की धारा-188 के तहत इसे अपराध बनाता है. प्राथमिकी इन सभी प्रभावों के बारे में चुप्पी साधे हुए है और इसलिए यह रद्द करने योग्य है.’’ याचिका के मुताबिक दिल्ली सरकार ने अस्पताल को तीन नोटिस जारी किया और पूरी प्रक्रिया किसी छिपे हुए उद्देश्य की पूर्ति के लिए दुर्भावना से प्रेरित लगती है.

अधिवक्ता गुंजन सिन्हा जैन के जरिये दायर याचिका में कहा गया कि एक ओर दिल्ली सरकार अपने नोटिस में कहती है कि अस्पताल बिना लक्षण वाले मरीजों के नमूनों को एकत्र कर जांच कर रहा है और दूसरी ओर यह कहती है कि ऐप आधारित नमूने का संग्रह नहीं हो रहा है.

याचिका में कहा, ‘‘ दोनों ही तर्क विरोधीभासी हैं क्योंकि यह तथ्य वे जानते हैं कि बिना लक्षण वाले मरीजों के नमूने आगे की जांच के लिए एकत्र किए जा रहे हैं और यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि प्रतिवादी को याचिकाकर्ता द्वारा जमा कराए गए आंकड़ों की जानकारी है.’’ याचिकाकर्ता ने कहा कि एक ओर दिल्ली सरकार ने अस्पताल कोविड-19 अस्पताल घोषित कर 80 प्रतिशत बिस्तरों को संक्रमित मरीजों के लिए आरक्षित कर दिया और दूसरी ओर उसे कोविड-19 की जांच करने से रोक दिया.