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मनाली, 3 फरवरी | हिमाचल प्रदेश की लाहौल घाटी को राज्य के दूसरे हिस्से से जोड़ने वाली रोहतांग सुरंग परियोजना स्थानीय लोगों के लिए समस्याओं से निजात पाने की एकमात्र उम्मीद की किरण है।  प्रतिवर्ष जाड़े के मौसम में जब लाहौल घाटी का तापमान शून्य से 20 डिग्री नीचे चला जाता है और इलाके में भारी हिमपात के कारण कम से कम पांच महीने के लिए लाहौल एवं स्पीति जिला राज्य के दूसरे भागों से कट जाता है, तब राज्य सरकार हेलीकॉप्टर की सहायता से घाटी वासियों के लिए रोजमर्रा की जरूरत के सामान पहुंचाती है, लेकिन सरकारी हेलीकॉप्टर सप्ताह में एक ही बार सामानों की आपूर्ति के लिए यहां आता है। Also Read - अतुल बेडेडे बड़ौदा महिला क्रिकेट टीम के कोच पद से हुए सस्पेंड, जानिए वजह

केलांग के रहने वाले 80 वर्षीय वृद्ध खजाना राम ने आईएएनएस को बताया, “हम चाहते हैं कि रोहतांग सुरंग का काम समय से पूरा हो जाए, ताकि हमारी समस्या खत्म हो।” उन्होंने कहा कि रोहतांग र्दे से होकर बनाई जा रही सुरंग का काम पूरा होने में हो रही देरी चिंता का विषय है, चूंकि इस सुरंग के जरिए हर मौसम में लाहौल एवं स्पिति से राज्य के दूसरे हिस्सों का संपर्क बना रहेगा।

सिस्सु गांव के रहने वाले सोनम डोलकर ने कहा, “दिसंबर महीने में रास्ता बंद होने के बाद मटर और आलू के अलावा यहां कुछ नहीं मिलता। पांच महीनों तक हमें सूखी सब्जियों और मांस पर निर्भर रहना पड़ता है।” हिमाचल प्रदेश में 1,495 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली रोहतांग सुरंग की आधारशिला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के कार्यकाल में 28 जून 2010 को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा सोलंग घाटी के पास रखी गई थी।

आधिकारिक सूत्रों ने आईएएनएस को बताया कि घोड़े की नाल के आकार वाली 8.8 किलोमीटर लंबी सुरंग का निर्माण कार्य फरवरी 2015 तक पूरा हो जाना था, जिसकी नई समय सीमा 2017 तय की गई है। सूत्रों ने कहा कि सुरंग के लिए खुदाई का काम लगभग आधी दूरी तक पूरा हो चुका है, लेकिन देरी के कारण लागत में 500-600 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च आएगा।

राष्ट्रीय जनजातीय आयोग के अध्यक्ष रवि ठाकुर ने आईएएनएस को बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सुरंग निर्माण में हो रही देरी से अवगत कराया है। यह परियोजना बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ) और स्ट्राबग-एफकोन्स को सौंपी गई है, जो भारत के एफकोन्स इंफ्रास्ट्रक्च र लिमिटेड और स्ट्राबग एसई ऑफ ऑस्ट्रिया का साझा प्रयास है।