नई दिल्ली. शरद जोशी का नाम हिन्दी साहित्य की व्यंग्य विधा में अग्रणी पंक्तियों में है. उनके लिखे व्यंग्य और कटाक्ष सर्वकालिक प्रासंगिक हैं. लेकिन शरद जोशी ने व्यंग्य के अलावा हिन्दी में कहानियां और लघुकथाएं भी लिखीं. उनकी लिखी लघुकथाओं में भी हमें व्यंग्य की धार देखने को मिल जाती है. खासकर राजनीति के संदर्भ में तो इनके लिखे व्यंग्य का कोई सानी ही नहीं है. खासकर वर्तमान समय की राजनीति के संदर्भ में देखें तो वर्षों पहले लिखे गए ये व्यंग्य आज भी प्रासंगिक जान पड़ते हैं. पेश है देश-काल, राजनीति और बुद्धिजीवियों पर लिखित शरद जोशी की दो लघुकथाएं. Also Read - 'इंडिया' शब्‍द हटाकर 'भारत' या 'हिंदुस्तान' करने की पिटीशन पर SC में 2 जून को सुनवाई

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शरद जोशी : 50 साल पहले लिखा 100 साल बाद का व्यंग्य

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बुद्धिजीवियों का दायित्व

लोमड़ी पेड़ के नीचे पहुंची. उसने देखा ऊपर की डाल पर एक कौवा बैठा है, जिसने मुंह में रोटी दाब रखी है. लोमड़ी ने सोचा कि अगर कौवा गलती से मुंह खोल दे तो रोटी नीचे गिर जाएगी. नीचे गिर जाए तो मैं खा लूं.

लोमड़ी ने कौवे से कहा, ‘भैया कौवे! तुम तो मुक्त प्राणी हो, तुम्हारी बुद्धि, वाणी और तर्क का लोहा सभी मानते हैं. मार्क्सवाद पर तुम्हारी पकड़ भी गहरी है. वर्तमान परिस्थितियों में एक बुद्धिजीवी के दायित्व पर तुम्हारे विचार जानकर मुझे बहुत प्रसन्नता होगी. यों भी तुम ऊंचाई पर बैठे हो, भाषण देकर हमें मार्गदर्शन देना तुम्हें शोभा देगा. बोलो… मुंह खोलो कौवे!’

इमर्जेंसी का काल था. कौवे बहुत होशियार हो गए थे. चोंच से रोटी निकाल अपने हाथ में ले धीरे से कौवे ने कहा – ‘लोमड़ी बाई, शासन ने हम बुद्धिजीवियों को यह रोटी इसी शर्त पर दी है कि इसे मुंह में ले हम अपनी चोंच को बंद रखें. मैं जरा प्रतिबद्ध हो गया हूं आजकल, क्षमा करें. यों मैं स्वतंत्र हूं, यह सही है और आश्चर्य नहीं समय आने पर मैं बोलूं भी.’

पीएनबी में होता 'नमक का दारोगा' जैसा अफसर तो नहीं भाग पाता नीरव मोदी जैसा 'अलोपीदीन'

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लक्ष्य की रक्षा

एक था कछुआ, एक था खरगोश जैसा कि सब जानते हैं. खरगोश ने कछुए को संसद, राजनीतिक मंच और प्रेस के बयानों में चुनौती दी – अगर आगे बढ़ने का इतना ही दम है, तो हमसे पहले मंजिल पर पहुंचकर दिखाओ. रेस आरंभ हुई. खरगोश दौड़ा, कछुआ चला धीरे-धीरे अपनी चाल.

जैसा कि सब जानते हैं आगे जाकर खरगोश एक वृक्ष के नीचे आराम करने लगा. उसने संवाददाताओं को बताया कि वह राष्ट्र की समस्याओं पर गंभीर चिंतन कर रहा है, क्योंकि उसे जल्दी ही लक्ष्य तक पहुंचना है. यह कहकर वह सो गया. कछुआ लक्ष्य तक धीरे-धीरे पहुंचने लगा.

जब खरगोश सो कर उठा, उसने देखा कि कछुआ आगे बढ़ गया है, उसके हारने और बदनामी के स्पष्ट आसार हैं. खरगोश ने तुरंत आपातकाल घोषित कर दिया. उसने अपने बयान में कहा कि प्रतिगामी पिछड़ी और कंजरवेटिव (रूढ़िवादी) ताकतें आगे बढ़ रही हैं, जिनसे देश को बचाना बहुत जरूरी है. और लक्ष्य छूने के पूर्व कछुआ गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया.